शनिवार, 18 जुलाई 2009

आहित्य दर्शन















"अदब
या तो अदब है या फ़िर बहुत बड़ी बेअदबी"

'सआदत हसन मंटो'


मंटो ने आगामी शक्तियों के प्रयोग के लिए एक कार्य योजना तैयार करली थी, मगर इस पर हावी हुयी सभ्यता एवं व्याकरण की सीमा ने कितना प्रहार किया है ? ये बात हाशिये में ही चुकी है। मैंने कब कहा ? कि इस दौर को बिना समझे ही वगैर किसी तन्क़ीद {आलोचना } छोड़ दिया जाए, मगर साहित्य वास्तव में एक परदा है, जो समाज की सीमाओं से मुखातिब होकर ही अन्तर भावनाओं पर डाला जाता है। बात इतनी है, कि लिखा क्यूँ जा रहा है ? इस बात को अगर सरलीकरण का स्वभाव या वक़्त की विडंबना कहा जाए तो इस शील तंत्र को सताना वाजिब होना चाहिए


शब्दों का मूल्य एवं शब्दों को मूल्य की ओर ले जाना एक उलझी सी बात है, जिसका सिरा ख़ुद शब्दों और अन्वेषक को नहीं पता। साहित्यकार, साहित्य की आधुनिक प्रवृति से खूब वाकिफ हो चुके हैं, और इसका माध्यम बाज़ार को बना दिया है, जो भिन्न भिन्न स्वाद निर्णय का केन्द्र बन चुका है। यही ज़मीन की बात है, कि कविता इरशाद की तरह मज़ेदार हो चुकी है। प्रेम खेतों मे गेंहूँ की बालियों की तरह उग रहा है, प्रौढ़ के थोड़े से पहले के सपने कविता को अपना ग्रास बना ही चुके हैं, सबसे अधिक हैरत की बात इसमें कि साहित्य या फ़िर इस शब्द का प्रयोग भी किया जाए, तो एक बड़े बुद्धिजीवी वर्ग ने भी इसमें रुपये की रसीद कटा ली है, कुछ लोग इस वर्ग को आलोचक संज्ञा देते हैं। साहित्य इस पूर्वाग्रही दिमागों पर फंसा तो है ही, बौद्धिक महफिल इसमें भी बिल्कुल हलाकान नहीं है कि, उनके कुछ हबीब ने इसे शताब्दी के चार भागों मे कैसे बांटा ? उम्र से पहले दिमाग मे उगी कविता कुछ युवा वर्गों के लिए उनकी भावनाओं को स्पष्ट करने का माध्यम है, और कुछ सवाल पूछे जाने पर, कुछ चेहरे बस उनकी भावनाओं एवं उमरिया बातों के पेचोखम मे मकडी की तरह फंसे मालूम होते हैं, उनकी शिकायत ये है, कि वे लोग हमें काफ्का या कीट्स की कविताओं का महत्त्व बताते हैं।


इन सबमें कुछ बुजुर्ग वर्ग भी हैं, जो पदुमलाल बख्शी के कथन के अनुसार अपने अतीत से अत्यन्त प्यार करते हैं, और गर्व भी। प्रौढ़ वर्ग अपना निशाना साहित्य में वीर रस को खोजते हुए दिखाई देता है, ये वर्ग भारत की चेतनाओं को अपनी बह्र {उर्दू साहित्य में ग़ज़ल के लिए प्रयुक्त मीटर} और छंद से जगाने की चेष्टा करते हैं, तथा इसे ही मृण्मय से चिन्मय की यात्रा कहते हुए, कारगिल प्रसंग दोहराने मे मसरूफ रहना पसंद करते हैं। कभी कभी ये तीनों एक दूसरे मे घुलमिलकर सृजन करते हुए भी दिखाई पड़ते हैं।


साहित्य है क्या ? ये मेरा प्रश्न, परिभाषा मांगने का दृष्टिकोण हरगिज़ प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि बस ये दिखाने के लिए है, कि यह जो दिखाई दे रहा है, इसे यूँ ही स्वीकार किया जाए।
यदि नहीं तो, विरोध के माथे पर प्रगतिशील,फासीवादी जैसे पत्थरों के निशाँ क्यूँ है ? है तो डर कहीं, कि यह सब क़यामत तक के ज़माने मे इस साहित्य की नींव बन जाए, और जब बौद्धिक भीड़ अपनी मीमांसा प्रस्तुत भी करे इस एजेंडे पर, तो भावना के आधार और भारत की साहित्य निरपेक्षता की दुहाई क्यूँ दी जाती है ? इस मुद्दे को व्यक्तिगत और सामान्य रूप से दोहराना सभी के लिए ज़रूरी है। जो वक़्त और उसकी परिवर्तनशीलता पर विश्वास करते हैं उनसे मेरी अधिक उपेक्षा है।

नहींअब वहाँ अर्थ खोजना व्यर्थ है
पेशेवर भाषा के तस्कर-संकेतों
और बैलमुत्ती इबारतों में
अर्थ खोजना व्यर्थ है
हाँ, अगर हो सके तो बगल के गुज़रते हुए आदमी से कहो
लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,
यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था

इस वक़्त इतना ही काफ़ी है

वह बहुत पहले की बात है
जब कहीं किसी निर्जन में
आदिम पशुता चीख़ती थी और
सारा नगर चौंक पड़ता था
मगर अब
अब उसे मालूम है कि कविता
घेराव में
किसी बौखलाए हुए आदमी का
संक्षिप्त एकालाप है

"धूमिल"







{पाठकों से निवेदन है, कि वे कृपया 'आहित्य ' से कोई शब्दकोशीय या लुगती मानी निकालें, या इसे 'आर्हत दर्शन ' समझने की भी भूल करें,यहाँ जिस तरह साहित्य, समाज की शाब्दिक माध्यम से सहायता करता है, या अपना सम्बन्ध उजागर करता है, परन्तु आहित्य यहाँ सिर्फ़ अहित का ही पर्याय है, इसे कुछ और समझा जाए।}


निशांत कौशिक

5 comments:

avinash ने कहा…

kya baat hai yaar sab ughaad ke rakh diya..aapne to sabke tote hi uda diye..ye vartmaan sahity ki sacchi sameeksha hai, aur aap badhai ke haqdaar hai.n...bahut accha likh rahe hain,, likhte rahiye..dhumil ki ye meri sabse pasandeeda kavita hai...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप ने एक वजनदार बात को वजनदार तरीके से रखा है।

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

आहित्य दर्शन?

Nishant ने कहा…

aadarneey nishant mishra ji..mitr mein ne sahity jo ki samaj ka hit ka paryay deta hai,, use aahity bata diya hai,, jo ahit ka paryay ho gaya hai...iska koi lugati ya literary meaning nahin hai...nishant mishr ji..


Nishant kaushik...

Nishant ने कहा…

aap sabhi ka shukriya...

nishant kaushik

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