शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

"वो जिसकी जुबां उर्दू की तरह"















" ख़बर
की सुर्खी में लिखा जमावड़ा देखा
तो गोया उर्दू की गर्दन पे फावड़ा देखा "



कभी-कभी हैरानगी से भर जाता हूँ, कि कोई भाषा कितने मसाइल लेकर पैदा होती है। कभी उसपर सामाजिक विलगता का चस्पा लगा होता है, तो कभी "क़ौमी ज़बान" जैसे शब्दों का स्लोगन। एक बड़ा प्यारा शब्द है, सभी ने सुना होगा नाम है "उर्दू" कभी कभी मैं तो कभी कभी अहले सुखन इसे ज़बान भी कहते हैं, पर ज़बान कहते ही इसके हर जानिब जैसे प्रश्नों का एक सिलसिला चल पड़ता है। और उपरोक्त लिखे मसाइल{समस्याएं} प्रसंग पर मेरा उर्दू सपना भी हरा हो जाता है, साकार का आकार लेते हुए। हिन्दोस्तान की सबसे परेशान भाषा उर्दू ही रही है। मेरे मित्र आदरणीय मनोज द्विवेदी जी के अनुसार अव्वल प्रश्न ये है, कि वह कौन से हालात थे जिसमें उर्दू का जन्म हुआ,और दोयम ये कि आज जब मैथिली,भोजपुरी जैसी विभाषाओं का तकनीकी रूप मे वैश्विक स्तर पर प्रयोग हो रहा है, तो उर्दू को बचाने के लिए प्रोफेसर गोपीचंद नारंग जैसे खालिस विद्वान् द्वारा जो इदारों के रूपों में स्कूल खोले जा रहे हैं, वहां शून्य क्यूँ पसरा हुआ है। उर्दू उस स्तिथि में है जिसे अधर कहते हैं, " डूब रहे उतराए" इस हिसाब से मुस्तक़बिल मुझे उर्दू के पक्ष में बहुत अच्छा संकेत नहीं दे रहा है बल्कि संदेहों से और भर रहा है। सरलीकरण ने हर चीज़ को बाजारी कर दिया है, और इंटरनेट ने तो कई ज़बानों का व्याकरण ही पलट दिया है, इसने ख़ुद ही नई ज़बानें ईजाद कर ली हैं। जहाँ बुक - बुकें, किताब-किताबें या ऐसे ही सैंकडों शब्दों को उनका खानदान ही छुड़वा दिया है. जिस में कहा जाए तो इर्दू और हिंगलिश जैसा रूप सामने रोड़ा सा खड़ा हुआ है। ऐसा नहीं है, कि भाषा का परिवर्तन आधुनिक औलादों ने ही चालू किया था! ज्यादा दूर नहीं सिर्फ़ थोड़ा सा पलटकर फ़िर भी देखा जाए तो पंजाब-पाकिस्तान में " बुल्ले शाह शेख,फैज़,इकबाल,वारिस शाह, या फ़िर सुलतान बाहू " जैसे सभी शायरों ने एक ज़बान का प्रयोग किया, जिसमें पञ्जाबी फारसी शब्द होते थे मगर उनकी लिपि उर्दू होती थी, जिसे "शाहमुखी भाषा" कहा जाता है। थोड़ा सा मुड़कर और देखा जाए तो भारत में मुसलमानों के आगमन से अभी तक तो बहुत सी ऐसी बातें खुलकर सामने आती हैं।

सभी शब्दकोशों में उर्दू शब्द का अर्थ तुर्की के अनुसार छावनी अथवा छावनी की भाषा से लगाया जाता रहा है, यह सही होने के बाद भी यूँ ग़लत है कि उर्दू भाषा अरबी,फारसी,तुर्की तीनों की लिपि तथा शब्दावली से प्रेरित है। इसमें गुरेज़ नहीं कि इसमें अरबी फारसी के "क़ाफ़,ऍन,गैन,ज़े,सीन,सुआद,ज़ुआद" आदि शब्दों की श्रृंखला है, और सनद रहे कि तुर्की लिपि का उर्दू से कोई सम्बन्ध नहीं है, हाँ तुर्की के बहुत से शब्द "लाश", "तलाश" आदि उर्दू में ज़रूर उपस्तिथ हैं। मगर प्रश्न ये आता है, कि बाक़ी के शब्दों का उद्भव कहाँ हुआ ? साथ ही हिन्दी के भारी आवाजों वाले शब्दों को उर्दू मे लिखने के लिए "दो चश्मी हे" का प्रयोग किया जाता रहा है। अगर ये माना जाए कि तुर्कों के भारत आगमन पर वे अपनी मूल भाषा अरबी,फारसी,तुर्की साथ लाये थे, और भारत में आते ही उन्हों ने देशज के साथ मिलकर उर्दू का निर्माण किया, तो इसके साथ प्रश्न ये उठता है कि अमीर खुसरो को ही लिया जाए, तो उसके क़लाम{गुरार्तुल कमाल,नोह सिपहर} पढ़के ये गुमान टूटना चाहिए, कि इतनी आसानी से उस वक्त फारसी और देशज मिल कैसे ? खुसरो का एक 'अर है।

" शबान हिज्राँ दराज़ चूं जुल्फ, बरोजे वसलत चूं उम्र कोताह।
नींद नैना अंग चैना आप आवें भेजें पतियाँ॥ "



इन दोनों मिस्रों को देख कर इनका ताल्लुक भी दुरुस्त मालूम होता है। डाक्टर शम्शुर्रह्मान फारुकी के अनुसार भारत में मुसलमानों के आगमन के वक़्त खालिस फारसी का दौर रहा, और बहुत समय बाद भाषा देशज से मिली और मुसलमानों ने इस पर विचार करके कि भारत मे इन तीनों भाषाओँ को किस तरह से एक साथ प्रयोग किया जाए,इन विचारों की समष्टि उर्दू को कहा गया। पुनः ये सोचना चाहिए, कि भारत मे तुर्क,अरबी,फारसी तीनों के आगमन के बावजूद सिर्फ़ फारसी भाषा ही काव्य एवं गुफ्तगू के लिए क्यूँउपयोगी मानी गयी ? अगर तुर्की को भी माना जाए तो अरबी भी संस्कृत की तरह समृद्ध भाषा थी, और वास्तव में उर्दू मे लिखने के लिए जो बह्र प्रयोग की जाती है, वह भी अरबी की देन है, मज़े की बात ये की डॉ. फिराक गोरखपुरी साहब और एह्तेशाब हुसैन साहब आदि ने भी ये मौजूं अपनी बहुतेरी तख्लीकात में क्यूँ उछाला ? इस बात को छोड़ ही देना चहिये की उर्दू को इस्लामिक संस्कृति से जोड़ा क्यूँ जा रहा है ? क्यूंकि उर्दू भाषा का आधार कुल मिलाकर अरबी फारसी एवं तुर्की हैं, ये तीनों इस्लाम प्रधान देश हैं सो संस्कृति का रंग आना वाजिब है।

मुसहफी के अश'आर हैं :-

" वाकिफ नहीं ज़बान से उर्दू की तिस पे आह/ क्या क्या करते हैं अज़ीज़ अश'आर का घमंड "

" अलबत्ता मुसहफी को है रेख्ते मे दावा/यानी के है ज़बान दाँ उर्दू की वो ज़बाँ का "


पहले 'एर मे उर्दू से शाहज़हांबाद का पता दिया जा रहा है, और दूसरे में भी दिल्ली का {पाठक ध्यान से देखें अन्तर समझ आवेगा,ध्यान रहे दिल्ली का एकनाम या पुराना नाम शाहजहाँबाद भी था,अर्थात शाहजहाँबाद तथा दिल्ली से एक ही मुराद है} क्यूंकि यह सन्दर्भ मुसहफी के जिस दीवान से लिया गया है, उसकी रचना का समय भी वह दीवान स्पष्ट करता है, कि मुसहफी उस वक्त दिल्ली में थे तथा ये भी, कि संदर्भित दीवान की रचना दिल्ली में भी हुयी। मूलतः मुसलमानों का आगमन हिन्दुकुश की तराई से रहा है। सो उर्दू भाषा का व्यापक असर, गुजरात,पंजाब,दिल्ली,उत्तर प्रदेश मे देखने को मिलता ही है। हाँ ये भ्रम ही सही कि उर्दू सिर्फ़ छावनी का अर्थ देती है,मगर "उर्दू मुअल्ला" के बाद तो ये निश्चित कर ही दिया गया, क्यूँ मुअल्ला एक छावनी के रूप में ही प्रयुक्त होता रहा है, {जितना कि में जानता हूँ परन्तु अर्थ के रूप में इसके कई अर्थ मिलेंगे } इस आधार पर "उर्दू मुअल्ला" छावनी की भाषा और मुअल्ला से धीरे धीरे रोजाना प्रयोग में वह उर्दू पर गई, और लोगों ने इसका अर्थ इसी आधार पर लगाया कि उर्दू छावनी की भाषा है और इसका अर्थ छावनी होता है, कम से कम उर्दू शब्द कितना पुराना है इसको जानना आसान होगा मगर यहाँ लिखना थोड़ा मुश्किल होगा। और उर्दू के कितने अन्य नाम हैं, " दकनी,हिन्दवी,गुजरी,रेख्ता " सभी जानते हैं। कबीर एवं मीर के ये उदाहरण कुछ " रेख्ता एवं दकनी " का ही रूप स्पष्ट कर रहे हैं।


"हमन हैं इश्क मस्ताना"
या फ़िर
"नज़र मे सभूं की खुदा कर
चले"


आशा है, कि आप ये समझते होंगे ग़ालिब जिस ज़बाँ मे कलाम लिखते थे ज़ाहिर है कि उस ज़बाँ मे अपनी पत्नी से मुखातिब तो होते होंगे। सो ये तो अर्थ निकल गया की भारत मे उर्दू का उद्भाव सिर्फ़ भाषाई व्यवधान आने से हुआ था, तुर्कों की भारी भरकम फारसी को देशज हिन्दी से मिलने में थोड़ा वक़्त तो लगा मगर एक लम्बी राजनीति के बाद उन्होंने निश्चित कर ही लिया था, कि उर्दू जैसी भाषा का होना ज़रूरी ही था, तभी तो वे भारतीय संस्कृति के परिवेश में घुल मिल सकते थे, क्यूंकि फारसी,उर्दू,अरबी सभी भारत के लिए उस वक्त एक अनजानी अप्रायोगिक भाषा थी।


मुसलमानों के भारत आगमन के बाद भी कट्टरपंथी हिन्दुओं को इस भाषा का संस्कृति से अलग करना एक लक्ष्य की तरह रहा है। इस कवायद मे भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे विद्वान् भी शामिल थे। भारतेंदु के कई लेखों मे उर्दू के प्रति ज़हर साफ़ दिखाई देता है। {ज़रूरत पड़ने पर वो भी प्रस्तुत ज़रूर करूँगा}, और अकेले भारतेंदु जी ही नहीं आदरणीय लल्लूलाल जी "{प्रेमसागर}" ने भी इसके प्रति कई जगह ज़हर उगला है, मगर इनका कुल मिलाकर सामना उर्दू भाषा से नहीं उर्दू भाषा के जनकों से करना था। और भारतेंदु जी "निज भाषा" लिखकर जो लिखना चाह रहे थे वह मात्र अंग्रेज़ी नहीं उर्दू पर भी आक्षेप था। चुनांचे उर्दू भी परदेसी ज़बान थी अतः आगे पीछे प्रहार होते ही रहे, नज़दीक से देखा जाए तो हिन्दुओं में उर्दू ने नहीं, उर्दू की नींव इस्लाम के प्रति ही ज़हर भरा था। मुसलमानों के लिए भी हिन्दी एक "धार्मिक भाषा" ही रही है। खासकर उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उर्दू मुसलमानों की शान बन चुकी थी। सर सय्यद अहमद खाँ ने बाबू शिव प्रसाद के हिंदू जागरण पर विरोध तथा विद्रोह जताते हुए कहा था कि "मुसलमानों को अपनी भाषा पकड़े रहनी चाहिए" और उसके दूसरे ही पल हज़रत ने ये भी कह डाला कि "हिन्दी को गाली देकर मुसलमान बेचारे जायेंगे कहाँ ?"


आखिरकार जब पूरा देश आज़ादी के लिए लड़ रहा था, तो बहुत से मुसलमान भी इसमें तन मन से शामिल थे {सरदार जाफ़री,जोश} बहुत से मुसलमा ऐसे थे जो यहाँ भी अलग थलग थे, वे दीन के लिए लड़ना सर्वोपरि मानते रहे। सो मैंने कहीं पढ़ा था कि इसी को रविन्द्र नाथ ठाकुर ने "मुस्लिम विलगता" कहा है, मगर दूसरे पक्ष में भी "चकबस्त, जगन्नाथ आज़ाद,फिराक़" जैसे खालिस उर्दू शाईर थे। ये सिर्फ़ आजादी के दौर की बात नहीं थी, अंग्रेजों ने इस मुद्दे को बहुत पहले ही पकड़ लिया था, जिसे देखकर अंग्रेज़ी विद्वान् गिलक्रिस्ट ने कहा था, कि पूर्वी भाषाओं को रोमन लिपि में लिखना चाहिए। और हिन्दी लेखक इस भ्रम में जी रहे थे कि उनके पक्ष मैं फैज़ कह गए थे :- "उर्दू तो अब हिन्दी वाले ही जिंदा रखेंगे"

मुझे ये समझने में बड़ी कोफ़्त हो रही है, कि उर्दू का भविष्य क्या है? मगर ये लोगों को क्या बेचैन नहीं करता क्या कि उर्दू जैसी समृद्धशाली साहित्यिक भाषा को सिर्फ़ संस्कृति के लिए त्याग देना अच्छा नहीं होगा। इस छोटे से लेख का अर्थ उर्दू की कहानी नहीं उसके संघर्ष से भी अवगत कराना है। और ये निवेदन है, कि कोई तरीका ईजाद नहीं होना चाहिए जो उर्दू को बचा सके। नहीं तो वह वक़्त दूर नहीं जब कहा जाएगा कि "एक थी उर्दू"

निशांत कौशिक

8 comments:

बेनामी ने कहा…

Behtreen lekh...nishant ji..urdu par ye jo takhleeq aapne di hai ye umda tanqeedon ki nazar se bhi ek baar sarsara ke guzregi...kyunki aapne jo mantiq diye hain,, ve mujhe nahin lagta ki kisi qutub mein mileinge jabki mein khud urdu uni. ka aur khaas hayedrabad ka bashinda hun..mubariq...aap aise hi likhte rahiye..aapki ye takhleeq mujhe pasand aai..mein urdu subjects par kuch research bhi kar raha hun aapki takhleeqat meri madad karengi meri hasrat hai ye...manoj ji ne jitna accha question kiya hai,, utna hi umdaa uttar nishant ji ka hai,,, aur aise lekh likhne ke liye acchi khaasi mashq se zyada mashaqqat karni hoti hai..khuda saath rahe...aameen..ye blog bahut aage jaye..

Adil rizvi,
Maulana Azad National Urdu University..
hayedrabad {a.p.}

kb ने कहा…

lajavaab lekh hai.
keep it up boss :)

समय ने कहा…

कई उचित प्रश्न उठाता आलेख।
उर्दू की पड़ताल आपने कई परिप्रेक्ष्यों में एक साथ की है, और सही दिशा में की है।
हालांकि यह भी सही है जो जरूरी होगा, नये इंसान के अनुकूल होगा वह सब बचा रहेगा।

और ऐसे में उर्दू जैसी नज़ाकत कैसे छूट सकती है।

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

विचारोत्तेजक आलेख...
अभी लिंक रख लिया है...गंभीरता से दोबारा पढ़ने के लिए..

avinash ने कहा…

nishant ji,, behtreen lekh, aur agrrsiveness ki bhi bilkul kami nahin hai.. aisi bahut si baatein hai urdu ke baare mein jo mujhe nahin pata thin,, aapka lekh atyant mahatvpurn hai tatha ye ek zaruri subject bhi ban sakta hai..shodhadi ke liye... bahut accha.. abhi tak aapke blog mein jitne lekh padhe sab ke sab acche lekh hain...purshottam agrwaal ji ka "chand baatein kahni hai" bhi bahut accha laga..

Avinash sharma..

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

बेनामी ने कहा…

accha lekh hai, nishant bhai..urdu par aapki kitni gahri pakad hai,vo malum hi ho raha hai,likhte rahiye, hanste rahiye, blogjagat mein aapka swagat hai.

kuldeep arora

asim khan ने कहा…

hi... i ws going through my frnd profile n i saw ur hindi scraps.. then i found ur blog link in ur profile... i read many of ur writing.. they r really extremely good... i even liked the way u narrated ur ideas... but i do hv certain reservation abt ur views.. if ever met u..ll surely discuss them with u... over all good...keep it up :)

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