गुरुवार, १ अक्तूबर २००९

गाँधी और गांधीवाद


नहीं ये बिल्कुल भी सही जगह नहीं है, जब मैं गाँधी जी के जन्म से लेकर, नाथूराम गोडसे तक की मुलाक़ात का सचित्र वर्णन कराऊं। २ अक्टूबर ही नहीं १९४७ के बाद हर पल हर दिन गाँधी जी का दिया हुआ है, सो थोड़ा सा याद करना आवश्यक है. चूँकि १९४७ की आज़ादी में मुख्य हस्तक्षेप गाँधी जी का था, तो स्वाभाविक सी बात है कि आजादी का मुख्य कारण गाँधी जी ही बने, और जब हिस्से में आए देश की यथास्थिति का भी वर्णन करें तो गाँधी जी को भी याद करना वाजिब है।


वास्तव में गाँधी और गांधीवाद, गाँधी जी के जन्म से ही एक दूसरे से गुत्थमगुत्था होते रहे, और तमाम अनुभवों के बाद अंततः गाँधी जी द्वारा ये घोषणा कर दी गई, कि सात्विक, मर्यादित,अहिंसक और शुद्ध विचारधारा ही मेरे पूर्ण दृष्टिकोण का परिणाम है। गांधीवाद में गाँधी जी के समकालीन भारत में तमाम परिवेश, विधान, विचार मौजूद थे, और इन सब की गांधीवाद में मौजूदगी मुख्यतः नज़र आती है, गांधीवाद से सहमति का आधार भी यही रहा कि उन सात्विक परिवेशों,परिधानों और विचारों का भारत में तिलिस्म छाया रहा, और गाँधी जी के अव्वल चरित्र में ये सारे तिलिस्म ही मौजूद थे, अतः भारत वासियों ने गांधीवाद की जी भर कर प्रशंसा की।


चूँकि भगत सिंह ईश्वर,धर्म,जातिवाद,पूंजीवाद, सामंतवाद आदि के घुर विरोधी थे, इस वजह से गाँधी जी ने भगत को कभी उत्तेजना से भरा हुआ जवान खून कहकर टाल दिया। मैं भगत सिंह पर केंद्रित अपने पूर्व लेख में स्पष्ट कर चुका हूँ, कि भगत सिंह की विचारधारा आज़ादी के बाद निश्चित तौर पर उभरने वाली राष्ट्रीय संकीर्णता जो कि आज हर क्षेत्र में है ही, के ख़िलाफ़ थी।


हमारे साथ बड़ी समस्या है कि हमने अपनी शैशव पीढी को आज़ादी संग्राम में हिस्सा लेने वाले हर व्यक्ति को "स्वतंत्रता संग्रामी" इन दो शब्दों के साथ बाँध दिया। ये बुनियाद यदि स्कूलों में बचपन से डाली जाए कि भगत सिंह के राष्ट्र स्वतंत्रता के विचार अलग थे तथा गाँधी के अलग। इन में से कौन सही था, कौन ग़लत या दोनों सही थे, दोनों ग़लत के बीच बच्चे ख़ुद अन्तर करेंगे।


भगत सिंह के साथ रहते हुए भी मैं बिल्कुल नहीं कह सकता की गांधीवाद से मैं पूर्ण रूप से असहमत हूँ, मैं बस असहमत इस बात पर हूँ कि सत्य-असत्य सिर्फ़ धार्मिक या सात्विकवादी विचारों से निश्चित किए जा रहे हैं। तो निश्चित ही हिंदू,मुसलमान और सभी धर्मों के अनुसार वे ईश्वर के बारे में तो एकमत होंगे मगर कर्मकांडों मे हर धर्म सत्य-असत्य की अलग व्याख्या करेगा। गाँधी जी की वैचारिक रुपरेखा में यही समस्या रही है कि सत्य-असत्य की व्याख्या के लिए वे उस युक्ति की सहायता लेते हैं जो कि अन्य युक्तिओं से कम से कम वैचारिक मतभेद रखती है। अपनी आसानी के लिए हम इसे धर्म भी कहते हैं।


जहाँ गांधीजी गीतावादी थे, चातुर्वर्ण व्यवस्था तथा हरिजन रूपांतरण के सहयोगी यहाँ भगत सिंह सत्य-असत्य की व्याख्या परिस्थिति के अनुसार निश्चित करते थे, और चातुर्वर्ण व्यवस्था के सख्त ख़िलाफ़। इस मुश्किल दौर में भी यदि गाँधी जी की पुस्तक " सत्य के प्रयोग " पढ़ी जाए तो सभी कुछ क्रमवार समझ आवेगा, और भगत सिंह के समस्त लेखों को पढ़कर, वैचारिकता का प्रतिशत कहाँ घटता है कहाँ बढ़ता यह भी समझ में आ जाएगा। धूमिल के चंद शब्दों के बड़े बिम्ब के साथ लेख समाप्त करता हूँ।




"हर तरफ धुआं है
हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है

अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-
तटस्थता। यहां
कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिए, सबसे भद्दी
गाली है

हर तरफ कुआं है
हर तरफ खाईं है
यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है"

"सुदामा प्रसाद पाण्डेय"


_निशांत कौशिक

बुधवार, २३ सितम्बर २००९


" रंजीत के साथ मत खेला करो " कविता स्वच्छ तर्क के साथ जमा की हुई नैतिक भाषा का पूरा दांव लगाने के बाद अंततः स्पष्ट करती है, कि पीड़ा की कुछ हद तक की जाने वाली शाब्दिक परिभाषा को बोध से जोड़कर कैसा चित्र बनता है, और चुनांचे पीड़ा का बोध ही पीड़ा को कह सकता है, इस आधार पर कहा जा सकता कि यह कविता पीड़ा का शाब्दिक पर्याय है, जो भावबोध, शाब्दिक हेतुवाद और साहित्य में उपस्थित होकर निभाए जाने वाले नियमों का चिट्ठा है ।

" रंजीत " शब्द का अर्थ यहाँ यथास्थिति में ग्रसित समाज से है, जो यथास्थिति में शामिल होने का दुःख नहीं करता साथ ही "स्वीकार" शब्द से जुड़कर लंबे दिलासे का सहयोगी बन जाता है, आजादी की घोषणा कर देता है। मूलतः यह रचना एक मूल्यांकन है, समाज के प्रति क्या है ?, क्या नहीं ? और क्या होना चाहिए ? के प्रति. रितेश मिश्रा की अधिकतम कविताओं को यदि समग्र रूप से समझा और पढ़ा जाए तो ये बात ज़ल्द समझ में आ सकती है।

हमारा अतीत तथा हर दौर आलोचना और गुणगान के साहित्य एवं अनुभवों में प्रचुरता से रमा हुआ है, और यदि पुनः आलोचना मात्र करने का दायित्व हम में से किसी को मिल जाए तो यह वही बात होगी कि " सत्तू उड़ा, पितरों को। " मार्क्स ने कहा था " दार्शनिकों ने दुनिया की व्याख्या मात्र की है, असल सवाल यह है, कि इसे बदला कैसे जाए " मैं मार्क्स के कथन से पूरी तरह सहमत हूँ, क्यूंकि " रंजीत के साथ मत खेला करो " कविता भी वैयक्तिक अनुभवों की फहरिस्त में बोध हस्ताक्षर करती है, इससे और कुछ नहीं समझ एवं समझदारी के मध्य दो राय बनते हैं, पहला पलायन तथा दूसरा बदलाव, और मानने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि बदलाव सिर्फ़ विचारों एवं साहित्य में आया है, अगर यही प्रगतिशीलता है,तो माना जाए कि हम बहसों में अव्वल हैं, मगर बदलाव की कल्पना सिर्फ़ भगत सिंह की जीवनी पढ़कर कुछ समय का देशभक्ति उत्तेजन मात्र है।

अगर यह बोध पेशेवर बुद्धि से गुज़र जाए तो शायद तिरस्कार और ना जाने ऐसे ही कितने शाब्दिक आक्षेप द्वारा बाँध लिया जाएगा। केन्द्रीय बिम्ब यही है, कि अतीत के साथ समर्थता को बिना जोड़े स्वीकार कर लिया जाए तो " मेरी गलती कहाँ है " जैसे वाक्यों का आना सुलभ एवं वाजिब हो जाता है, यह भी कि " दिन भर जैसे किसी नशेड़ी ने नशा किया हो " जैसी दैनिक बेचैनी, जो तोड़ तो रही है, मगर बेचैनी अपने आप को सही साबित करती है कि मुझे स्वीकार नहीं, प्रश्न यह कि क्या पलायन और बहस के मध्य कोई आन्दोलन फंसा हुआ है, जिसे न देख पाना मेरी अब तक की असमर्थता थी। घटाटोप वर्णन, तथा कविता के बाहर लांघकर बिना किसी दृष्टिकोण के समझा जाए तो बोधगम्यता के सामने शब्दों का बौना होना क्या होता है, समझ आ जाएगा। कविता के अन्तिम छोर में एक शब्द बहुत गहरे तथा प्रश्नवाचक रूप में सामने आ खड़ा हुआ है, " वही आवाज़"। यह आवाज़ दरअसल कविता लिखे जाने के पहले की स्थिति एवं प्रतिद्वंद्वियों से साम्य रखती हुई, प्रतिद्वंद्वियों द्बारा ही पलायन के लिए वातावरण निर्मित करने का माध्यम मात्र है। सांकेतिक रूप में शब्द "रंजीत" अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। मर्म एवं अनुभव की समष्टि इस रचना को सही मानने में कोई गुरेज़ पैदा नहीं होने देता। रितेश मिश्रा की कविता प्रस्तुत है।

रंजीत के साथ मत खेला करो

बहुत कुछ टूट गया
खून मेरे प्रश्नों की तरह
कहीं कहीं बह रहा है
और कहीं थक्का बांध गया है
आँखें,
मानो, किसी नशेड़ी ने दिन भर कोई नशा किया हो
पंजे दोनों तने हुए
जैसे क्रोध उतारने की कोई कला हो
होंठ बुदबुदा रहे हों जैसे
" मैं ने तो कुछ नहीं किया, आख़िर मेरी गलती कहाँ है ? "
आवाज़ आई
नेपथ्य से, वही आवाज़
कितनी बार कहा है
" रंजीत के साथ मत खेला करो "


_ निशांत कौशिक

मंगलवार, १ सितम्बर २००९

धर्मों के थोथे कर्मकाण्ड


भावनाएं भविष्य के खतरे की बू तो पहले से ही देने लगती है, मगर इस आनंद और संवेदना को हम एक ही दायरे में देखने लग जाते हैं, चाहे वह धर्म हो या भारत "माता"। भारत को माँ मानकर सज़दा करने में लोगों को एतराज़ अक्सर रहा ही है, और यह परिस्थिति उन्हें उनके धर्म के बायें ओर खड़े होने का फरमान ज़ारी करती है। बंकिम बाबू के आनंदमठ में विधर्मियों से जब विद्रोह होता है, तो सम्प्रदाय द्वारा वंदना में माँ " दुर्गा" की प्रार्थना रूप में "वंदे मातरम्" गाया जाता है, सिर्फ़ नबीमूलक धर्मों की बात करें तो एकेश्वरवाद या तौहीद की शर्तों के अनुयायी होने के कारण अन्य किसी के आगे सज़दा करना शिर्क है, गुनाह है, कुफ्र है, और वह काफिर है [यह कितनी सत्य बात है, मैं निश्चित नही हूँ ? ]।
और दूसरी बात यह की आधुनिक थोथे धार्मिक कर्मकांडों खासकर हिंदू धर्म में जो प्रचलित है, यह भी भविष्य के लिए, खतरे की बू ही है। गणेश चौथ से अनंत चौदस तक रखी जाने वाली प्रतिमाएं, या प्रथम से लेकर नवमीं तक रखी जाने वाली दुर्गा प्रतिमाएं, [ इसमें विश्वकर्मा मूर्ति आदि भी जिस तरह शामिल है ] , अन्तिम दिन जिस तरह नदियों में बहाई जाती है, इसका सवाब क्या है ? मुझे नहीं पता, मगर भारी मात्रा की मिट्टी और मूर्तियों में प्रयुक्त रंगीन तत्व नदियों को दोज़ख तक ज़रूर ले जा रहे हैं, यह दूसरा मसला है, कि दुर्गा पूजन करने वाले ठेकेदार महिला नाम के तत्व को समझते हैं कि नहीं। बहुत बड़ा बुद्धि के जीवियों का वर्ग इस प्रथा को सहयोग देता आ रहा है कि यह पुरानी प्रथा एवं आस्था है, जिसे बदलना मुमकिन नहीं। और उस सत्य का क्या जो कुछ सालों में पानी कि गंदगी और उसके अभाव के रूप में हमारे सामने आ रहा है ? या उन्हें अन्य देशों में बहने वाली नदियाँ दिखाने चाहिए जहाँ झांके जाने पर पानी ही नज़र आता है, और गंगा में झाँकने पर पानी छोड़ कर सब कुछ नज़र आजाता है।
भारत में पली और मेहमान हुई कई विचारधाराओं के साथ यह घोर समस्या रही है कि वे भारत को परिवर्तित कितना कर सकीं ये नहीं पता हाँ भारत ने अपने हित में मोड़ने के कारण उनका सत्यानाश ज़रूर कर डाला।

" तुझ को ख़ुदा कहूँ, या ख़ुदा को ख़ुदा कहूँ
दोनों की शक्ल एक है किसको ख़ुदा कहूँ ॥ "

भारत में समाजवाद, और प्रगतिशीलता के भी दो-दो चेहरे हैं, जिनके सामने "किसको ख़ुदा कहूँ" जैसे प्रश्न खड़े हैं। साथ ही ये भी कहा जाए कि धर्म समाज में "अधिकतम" का आर्थिक सहयोगी बन गया है, और विद्रोही उनके लिए वर्जित बाग़ की इजाज़त देने वाला शैतान है। अनुयायी ही विचारधारा का शोषण करके उसे अपने हित में किस तरह मोड़ता है, प्रकृति इसका बहुत बड़ा उदाहरण है।

" जा इलाही तुझे माफ़ किया
कि
आदम तेरा पहला गुनाह था "

मार्क्स का एक कथन है :-

" धर्म एक ज़ंजीर की तरह है, जिसके ऊपर खुशबूदार फूल बिछे हुए हैं। "

वाकई धर्म अपने अंतर्विरोधों से अधिक नहीं लड़ पाता, और उसके सर्वनाश का कारण भी वही अंतर्विरोध बनता है। और वैचारिक धाराओं में ग़लती होना स्वाभाविक है, क्यूंकि चिंतन सिर्फ़ चेतना शून्यता नही लाता, वरन स्वयं को स्थापित करने का आधार भी प्रस्तुत करता है।
गीता कभी आत्मा को स्थिर एवं अचल बताती है, कभी एक शरीर से दूसरे शरीर में गमन करने वाली। कृष्ण कभी कहते हैं कि दुनिया समय चलाता है और व्यक्ति का कर्म, कर्म का कारण मैं नहीं हूँ, उसकी अपनी बुद्धि है, न मैं कर्म हूँ न कर्ता, न कर्ता में विद्यवान। और कभी कहते हैं कि पेड़ का पत्ता भी मेरे बगैर नही हिल सकता, मानव के सारे कर्मों का लेखा जोखा निर्णय का मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही वक्त को अपने अनुसार ढालता हूँ [यह भी सनद रहे कि समय को रोककर कृष्ण ने गीता अर्जुन को सुनाई थी, और संजय उसके गुप्त दृष्टा थे]।
मुझे
संदेह है कि वेद व्यास ने अपने मत को महाभारत में २३ से लेकर ४०वें अध्याय तक अपने इष्ट के श्री मुख से कहलवाया है, और गीता का दृष्टिकोण तमाम महाभारत से सर्वथा इसीलिए भिन्न है क्यूंकि उसमें अद्वैतवादी उपनिषदों का निचोड़ है, और ऐसी ही एक और दार्शनिक रचना वेदांत दर्शन के रचयिता भी व्यास हैं

किसी
कि प्रसिद्ध उक्ति थी, कि :-

"अपने मत को सर्वमान्य बनने के लिए उसे अपने रहस्यवादी आदर्श का वक्तव्य बनाओ, लोग उसे आसानी से स्वीकार करेंगे "

यह समस्या सिर्फ़ हिन्दुओं के साथ ही नहीं वरन अधिकतम नबीमूलक धर्मों के साथ भी है

" ख़ुदा के वास्ते काबे से परदा उठा जालिम
कहीं ऐसा हो यहाँ भी कोई काफिर सनम निकले "

मुहर्रम में आनंद का आगमन अहादीस और क़ुरान दोनों में हराम है, जिसे शिर्क कहा जाता है। ख्रीष्ट में शैतान और ईश्वर दो अस्तित्व की तरह उभरते हैं।
"धर्म विरोधी" कबीरदास ख़ुद एक "धर्म" हो गए , लोग कबीरपंथी बन गए, मूर्ति विरोधी, बुद्ध की सबसे अधिक मूर्तियाँ है, कार्ल मार्क्स को समाजवाद का " मसीहा" बना दिया गया, आचार्य रजनीश को " भगवान् "संबोधन मिल गया, जे कृष्णमूर्ति को " आजादी का देवता" कहा गया , अल्बेयर कामू को " स्वतंत्रता का पुजारी ", सार्त्र को "अस्तित्व का अवतार" कह दिया गया, ताओ लाओत्से को " चेतना का पंथ"। ऐसे असंख्य उदाहरण हैं।

रजनीश का ही एक कथन है कि :-

"ईश्वर विद्वानों के साथ ही आता है, और उसी के साथ चला जाता है, बाकी अनुयायी बस दुग्दुगी बजाते रहते हैं "। दुर्गा सप्तशती के लगभग ७ अध्यायों में युद्ध ही युद्ध है, महाभारत युद्ध से अटा पड़ा है, रामायण में भार्या हेतु युद्ध किया गया है, कृष्ण भी स्वयं युद्ध का ही संदेश देते नज़र आते हैं।
फ़िर भी आजके द्वन्द्वादि वातावरण में इन पुरानी रणनीतियों से कैसे शान्ति स्थापित की जाए, ये जो कि किसी निश्चित परिस्तिथि को ही अन्तिम निर्णय मानते हैं, ये जो कि अपने मत से हजारों सालों का नेतृत्त्व करने का वचन देते हैं। इनका विश्वास किस हद तक किया जाए, ये सामने हैं, या फ़िर सहमत हुआ जाए कि

" कोई होई नृप हमें का हानि"... [ तुलसीदास]

लेख समाप्त करता हूँ अष्टभुजा शुक्ल जी की कविता " गणित के कुछ प्रश्न " के साथ जो कि मेरी पसंदीदा कविता है।

" गणित के कुछ प्रश्न "

(१)
" किसी धर्मस्थल के विवाद में

पांच हज़ार गोली से
तीन हज़ार गोले से
एक हज़ार चाकू से
और पांच सौ जलाकर मार दिए जाते हैं
तीन सौ महिलाओं को नाली
और दो सौ बच्चों को बकरा समझा जाता है
धर्म में सहिष्णुता का प्रतिशत ज्ञात कीजिये। "


(२)
" कोई दूकानदार
एक बोरी यूरिया में
एक बोरी पिसा नमक मिलाता है
तो उसकी आय
उसकी लागत की तिगुनी हो जाती है

वही खाद
एक लघु सीमांत किसान
जब अपने खेत में डालता है
तो उसकी आय
उसकी लागत की
आधी आती है
किसान की
किस पीढी़ का बच्चा
दूध भात खायेगा
एवं किस युग के किस चरण में
रामराज्य अथवा समाजवाद आयेगा?
"


निशांत कौशिक




बुधवार, १९ अगस्त २००९

परिवर्तन की परिभाषाएं


धूमिल की एक कविता का छोटा सा अंश है : -

" क्या आजादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई ख़ास मतलब होता है। "


बचपन छूटे समय हुआ। स्कूल में आज़ादी का अर्थ मेरे लिए नाश्ता वितरण में सम्मिलित होने का मुन्तजिर बनना बस था। उस वक़्त बनिए से भारत की शान "एक रुपये" में खरीदा करते थे, आज शायद तिरंगे की कीमत २ रुपये होगी। ज़्यादा अन्तराल नहीं आज अठारह वर्ष का हूँ, लेकिन आज़ादी सिर्फ़ १५ अगस्त में रोके रखना रास नहीं आता। इस लेख में भगत सिंह की विचारधारा कुछ स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ।

विद्रोह यदि सफल हो जाए तो क्रांति है, यदि सफल नहीं है, तो उसे लोग अपनी शब्दावली से संज्ञा दे दिया करते हैं। भगत सिंह का विचार भारत के तिरंगे की अपेक्षा भारत के प्रति अधिक था। यह सही बात है, कि जिस तरह की आज़ादी हमें प्राप्त हुई, उसे वर्ग विशेष आज़ादी कहा जा सकता है, और व्यवस्था को वर्ग शासन कहना अतिरंजना नहीं होगा, अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारत में भगत सिंह का संगठन इस बात से पूरी तरह से अवगत था, कि चंद बाशिंदों और सह्मत्कारों के हाथ में हाथ लेकर आज़ादी के स्तर पर पहुंचने का एक लंबा रास्ता था, एक लंबा सपना था, और इसका फलक कितना बड़ा होगा ये भी सोचना दुष्कर चिंतन था । भगत सिंह के सम्पूर्ण चिंतन और कार्य पद्धति को देखा जाए, तो एक बात स्पष्ट ज़रूर होती है, कि उनका समस्त ज़ोर आज़ादी हेतू नहीं था। वरन इस बात पर कि आज़ादी प्राप्त होने के बाद जो नई शक्तियां और समस्याएं उग्र होनी है, उनके लिए बेहतर निदान क्या हो सकता था ? अतः गांधीवादी चिन्तक एवं अनुयायी, भगत सिंह से सदैव इस बात पर विरोध में रहे, कि युवाओं के इस संगठन से आज़ादी के प्रति लोगों की सजगता जाग तो सकती है, मगर भारत की चली आ रही पूर्व संस्कृति को सम्पूर्ण तरह से नष्ट कर ही दिया जाएगा। और ये चिंतन यदि व्यापक हुआ तो इसकी विफलता १८५७ की तरह सोचना बिल्कुल ही विफल है। क्यूंकि भगत के उस समाजवादी विचारों का प्रभाव युवाओं में तेज़ी से पड़ता था, और हुकूमत से खिन्न, मौटे तौर पर भारतीय युवक, पहले से चली आ रही, सात्विक विचारधारा और कोरे हुल्लड़ से वाकिफ हो चुके थे।

भगत के स्पष्ट मायने यही थे, कि आज़ादी के बाद यदि भारत अंग्रेजों जैसे ही किसी शासक की तरह वर्ग विशेषता पर ध्यान देते हुए शासन करने लगे तो आज़ादी सिर्फ़ अंग्रेजों की अनुपस्थिति ही कहलाएगी। भगत सिंह को पहले भान हो चुका था, कि आज़ादी तो प्राप्त होगी ही, लेकिन मात्र अंग्रेजों से। यही भावी दृष्टिकोण भगत सिंह के चिंतन को खुले रूप से सामने रखता है, जो इस चिंतन से पिछड़ा उसने भगत सिंह को एक मात्र विद्रोही क्रांतिकारी माना जो, माओत्से तुंग की तरह आज़ादी हमारे हाथों में सोंपना चाहता है { हालांकि माओत्से के प्रति सभी के अपने विचार हैं } । समाजवादी चिंतकों ने यह स्पष्ट कर दिया था, कि भारत में समाजवाद को संस्कृति,सामंतवाद,पूंजीवाद और बहुत हद तक फासीवादियों से भी लड़ना है। भारत में आधुनिक वैज्ञानिक विचारधारा की देन " कंप्यूटर" आज भी जब घरों में आता है, तो नारियल फोड़ा जाता है। यह एक ऐसी संस्कृति है जिसने समाजवाद और प्रगतिशीलता दोनों के रोंगटे खड़े कर दिए हैं, कि समाजवाद,साम्यवाद,माओवाद के बाद यदि भारत में समाजवादी क्रांति होती है तो उसका नाम क्या होगा ? क्यूंकि भारत की विशाल संस्कृति को परिवर्तन से जोड़ना दुष्कर कार्य है। भगत सिंह सदैव आज़ादी से अधिक आज़ादी की बाद की अवस्था पर चिंतित थे। भले ही आज़ादी प्राप्त करने के लिए भगत सिंह का वह संगठन छोटा हो, मगर आज़ादी की बाद की अवस्था जिसमें हम जी रहे हैं, इसके लिए उस वक़्त उतना संगठन जोड़ने का श्रेय केवल भगत सिंह को जाता है। रघुवीर सहाय की एक कविता प्रस्तुत है : -


राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत
भाग्य विधाता है
फटा
सुथन्ना पहने जिसका
गुन
हरचरना गाता है

मखमल
टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी
छत्र चंवर के साथ
तोप
छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय
जय कौन कराता है

पूरब पश्चिम से आते हैं
नंगे बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा,उनके
तमगे
कौन लगाता है

कौन
कौन है वह जन-गण-मन-
अधिनायक वह महाबली
डरा
हुआ मन बेमन जिसका
बाजा
रोज़ बजाता है



निशांत कौशिक

सोमवार, १० अगस्त २००९

"माँ" एक संक्रामक प्रत्यय


रितेश मिश्रा जी की ये कविता, उस परम्परा के विरोध में है, जहाँ स्त्री की विशिष्टता उस पर रिप्लेस किए गए एक ख़ास संबोधन से होती है, जिन्हें हम कभी माँ तो कभी देवी तक बदलते रहते हैं हमारे शब्दकोशों के कुछ ख़ास शब्द हैं, जो आलागिरी से चमचमाते हुए प्रतीत होते हैं, और स्त्री के सम्पूर्ण शोषण के बाद वह शब्द उसे संतुष्टि प्रदान करने का रंगीन माध्यम बनते हैं और दुःख ये कि स्त्री इससे संतुष्ट है, मुद्दा यह कि चरित्र का विशेषण कोई अन्य चरित्र क्यूँ स्पष्ट कर रहा है, हमें स्त्री के व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बताने के लिए गुरु या देवी जैसे संबोधन महत्वपूर्ण क्यूँ प्रतीत हो रहे हैं, क्या माँ की स्वयं कोई उत्कृष्टता नहीं है कि उसकी विशेषता बनने के लिए हम किसी पद का निर्माण करते हैं ? और उसकी तुलना करते हुए उस पर देवी या गुरु जैसा संबोधन चस्पा कर देते हैं

कविता
न्तर्गत एक भाव यह भी है, कि माँ की ममता और वह सारे क्रिया कलाप जो कि शैशवावस्था में निभाए जाते हैं,वह समाज की अनुकृति अथवा पूर्व विकसित मान्यताओं का अन्धानुकरण मात्र है, रितेश की ये कविता इसी अन्धानुकरण के ख़िलाफ़ एक हलफनामा है

बिम्ब को मूर्खतापूर्ण अथवा दार्शनिक पूर्ण बातों में जुमले की तरह प्रस्तुत करना, उसपर अधिकार हथियाना मुझे फिलहाल सही नहीं लगता परन्तु गुरु की विशिष्टता अथवा किसी पारलौकिक देवी से किसी स्त्री का आवरण बना कर उसे पूज्य बनाना, स्त्री के पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करना कि "वेश्या के घर की मिटटी मिलाकर दुर्गा की मूर्ति बनती है" या फ़िर किसी देशज में माँ के नाम की गाली अपने रसीले जुमलों में टांगे फिरना, यह मुझे " सिमोन दा बोउवार " {The second sex} तथा "तसलीमा नसरीन" के इस कथन की याद दिलाता है, कि -


" भिन्न भिन्न संबोधन ही स्त्री के शोषण की आरंभिक नीति है " {सिमोन}

"स्त्री को भिन्न वर्गों में बांटा जाना उसके पतन और शोषण के क्रमानुसार सीढियां है " {तसलीमा}

क़ुरान में लिखा है :-

"दरअसल स्त्रियाँ मनुष्य ही नहीं हैं, वे भोग्य सामग्री हैं, मनुष्य के लिए{मनुष्य से आशय मेरे हिसाब से पुरूष ही होगा} स्त्री, संतान, ढेर सारा सोना -चाँदी और नस्ली घोडों के समूह, गाय बैल, एवं खेत खलिहान के प्रति आसक्त एवं अधिक आकर्षक रहे हैं, यह सब इस जन्म की भोग्य वस्तुएं हैं"

सुरः
अल इमरान आयत : १४

"स्त्री सिर्फ़ भोग्य वस्तु ही नहीं, अनाज का खेत भी है, तुम्हारी स्त्रियाँ तुम्हारे अनाज का खेत है, इसीलिए तुम अपनेखेत में जैसा चाहो बो सकते हो, जा सकते हो "।

सुरः
अल बकारा आयत : २२३

" भोजन खाकर स्त्री को जूठा देना" { गृहसूत्र १/४/११} { यह प्रथा बंगाल में आज भी है }

जाओ वैदेही तुम मुझ से मुक्त हो, जो करना है मैंने किया, मैंने रावण से युद्ध अपने राज्य और शासन से कलंक मिटाने के लिए कियामुझे पतिरूप में पाकर तुम ज़राग्रस्त हो इसीलिये मैंने रावण का वध किया, मेरे जैसा धर्म बुद्धि संपन्न व्यक्ति दूसरे के हाथ में आई स्त्री को एक क्षण के लिए भी कैसे ग्रहण कर पायेगातुम सच्चरित्र हो या दुश्चरित्र मैं तुम्हारा भोग नहीं कर सकता मैथिलि
{ रामायण - राम सीता संवाद - /२७५/१०-१३}

स्त्री के पक्ष एवं विपक्ष में हजारों प्रमाण एवं तर्क उपलब्ध हैं, इनका आशय धर्म से नहीं उन मान्यताओं से विरोध है जो स्त्री स्वतंत्रता के विरोधी है। यह सिर्फ़ इस्लाम, हिंदू नहीं, बहुत से धर्म में है जो कहीं सूक्ष्म तो कहीं व्यापक रूप में छाया हुआ है। रितेश की कविता प्रस्तुत है।


"माँ" एक संक्रामक प्रत्यय


माँ ...
मैं क्यों कह दूँ तुम्हें
देवी -?
क्यों ?
कि तुम मेरे पहले गुरू थे
जबकि मैं तुमसे उन सब के लिए लड़ा
जिनके लिए मैं अब भी लड़ पड़ता हूँ
तुम पहली और आखिरी थी
जिसने जोर से पकड़ी थी
मेरी लगाम
और तुम्हारे साथ ही पहली बार हुआ था
सत्ता के विरुध्द संघर्ष

माँ तुम्हे याद हैं
ये जो शब्दों की लड़ाई है न ये तुमसे ही शुरू हुई थी
जिसे तुम 'जुबान लड़ाना' कहती थी

मैं ये नहीं कहता
कि तुमने मुझे प्रेम नहीं किया
अथाह किया !
न ये -
कि मैं तुमसे प्रेम नहीं करता
बस मैं ये कहना चाहता हूँ
कि तुम मेरे प्रथम गुरू नहीं थे
गुरू कि मेरी अपनी परिभाषा है माँ !
नीर- क्षीर विवेक वाली !
तभी तो तुम्हारे कई सिध्दांतों
कई उपदेशों
पर मैं लड़ पड़ता हूँ ;अब भी
और तुम भी तो मुझपर अबतक
अपना थोपना चाहती हो !

मैं ये भी जानता हूँ
कि जितना तुमने इस समाज से एक्सट्रेक्ट (extract) किया
उतना ही इंजेक्ट किया
तुम उस समाज कि अनुक्रिति मात्र हो
उसी समाज की
जिससे मेरे कुछ शील
लेकिन गंभीर विरोध हैं
इसलिए ही तुम सामाजिक देवी होगी
पर मैं तुम्हें देवी नहीं मानता !!

और प्रेम _?
कसम से माँ..
जब भी तुम्हे याद करता हूँ
एक अदम्य स्फूर्ति आती है
धमनियों का रक्त नृत्य करने लगता है
स्वाध्याय का सूत्र खोजने लगता हूँ
स्वीकार्य की चेतना जागृत हो जाती है

तुम्हारे चश्में की पीछे वाली
आँखों ने
कितनी बार
मुझमें कितनी बार
ज्ञान की भूख जागृत की

ये तुम्हारा प्रेम ही तो है माँ
कि मैं कह सकता हूँ
कि तुम देवी नहीं हो
ये तुम्हारा मेरा भीतर होना ही है
कि मैं ये भी कह सकता हूँ
कि तुम मेरे प्रथम गुरू नहीं थे
क्यों _मानती हो न ?
मै अक्सर सोचता हूँ
सार्वभौमिकता के बारे में
वो जो कहतें हैं कि तुम
सार्वभौमिक देवी हो
तब कैसे बन गया वो अपशब्द
जिसमें तुम आते हो
कभी किया उसका संधि -विच्छेद
क्या विश्व कि कोई ऐसी देवी है
जिसके नाम की गाली दी जाती हो ?
जो मै भी बक देता हूँ

माँ ये तुम्हारे नाम की
अँधेरी खोह
बना दी गयी है
ये मर्दों ने बनायी है
ये स्त्री की पूर्णता का
एक भुतहा घर है
जिसमें कुछ आदि मंत्रो के द्वारा ही
घुसा जा सकता है
में वो मंत्र कभी नहीं पढूंगा माँ !
किसी के कहने पर नहीं |||

निशांत कौशिक