सोमवार, 24 मई 2010

बीते हुए को लेकर बिताने वाले समय के साथ



अपने समय पर हस्तक्षेप करना, एक अधिकार होता है जो अतीत और वर्तमान के परिदृश्यों के बोध को केंद्र में रखकर निभाया जाता है. ताहम ने जिस वैचारिक आन्दोलन की भूमिका के साथ ब्लॉग जगत में प्रवेश किया था, अनिश्चितताएं, अनियमितता एवं तकनीकी समस्याएं, योजनाबद्ध तरीकों से कार्य रेखांकन में रोक बनती ही रहीं हैं. मगर कुछ प्रमाणिक बिन्दुओं को केंद्र में रखकर उसपर अधिक से अधिक वैचारिक मुबाहिसे लेखों, कविताओं पर मीमांसा का शगल भी सफल रहा है भले कुछ ही स्तर तक. और इस तरह ताहम ने आज २५ मई को अपना एक वर्ष पूरा किया.

भावी योजनाओं के अंतर्गत कुछ प्रश्न भी रखे जा सकते हैं. मुख्यतः जो आलेखों के मध्य किसी न किसी माध्यम से उपस्थित रहेंगे.

युवा लेखन में विचारधारागत लेखन की प्रतिबद्धता का टूटना और परिणामतः समकालीन साहित्य का सामाजिक सरोकार क्या हो सकता है ?, रंगमंच और मौलिकता, कहानी और उत्तर आधुनिकतावाद, सरलीकरण का दौर एवं भाषा विज्ञान. साहित्य की राजनैतिक,दार्शनिक,सामाजिक एवं नैतिक सम्बद्धता.

तथा ऐसे ही कई बिन्दुओं पर आलेख प्रस्तुत करने की योजना होगी.

_निशांत कौशिक

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"ज़ुल्म अगर ज्यादा ही बढ़ गया हो
बढ़ा लेनी चाहिए अपनी कीमतें

कोड़ा खाने, चीखने चिल्लाने से होगा
यही बेहतर

अधिक दाम लेकर चुप रहना !! "

गुरुवार, 6 मई 2010

आलोचना के अधूरे प्रतिमान

६०-७० के दशक में परिपक्व हुआ नक्सलबाड़ी आन्दोलन आज घोर वैचारिक संकट से गुज़र रहा है. आन्दोलन के प्रमुख नेतृत्वकर्ता चारू मजुमदार और कानू सान्याल के हस्र के बारे में सभी जानते हैं. फिर भी, जिस हलके में नक्सल आन्दोलन को आज आँका और उसके मुताल्लिक दुष्प्रचार किया जा रहा, वह दोनों पक्षों को भयावह हाशिये में छोड़ सकता है.

भारत के समकालीन कम्युनिस्ट आन्दोलन में तमाम तरह की खामियों के बावजूद जो बेहतरी के प्रयास उसके द्वारा किये गए, उसे एक आदतन कार्यवाही के क्षेत्र में रखा जा सकता है. थोथे कम्युनिस्ट आलोचक (न कि कम्युनिज्म) जिनकी नज़र में सिंगुर-नंदीग्राम सबसे भयावह मसला, और विस्थापन है, "धर्म विरोधी कम्युनिज्म" अवधारणा के आधे अधूरे जुमले ज़बान में बांधे घूमना ग्लैमर हो चला है. फुकोयामा की किताब " द एंड ऑफ़ हिस्ट्री" या फिर राहुल सांकृत्यायन के ज़बान में "गलतियों से भरा इतिहास" जैसे वाक्यों को दोहराना दोहरे मापदंड के प्रमाण हैं, जो नपे तुले तर्कों से प्रतिवाद करते हैं. कम से कम मेरा दृष्टिकोण कतई भी भारत के वाम दलों की पैरवी करना नहीं है, वरन संक्षिप्त में इसके बारे में प्रचलित धारणा को अपने नज़रिए से स्पष्ट करना हैं.

व्यवहारिक बिंदु "छत्तीसगढ़ आज नक्सल आतंक का गढ़ बना हुआ है" "आए दिन उनके द्वारा किये जाने वाले अत्याचार" या इसी तरह की तमाम अखबारी धारणाओं को केंद्र में रखकर देखा जाता रहा है कि चीन - नेपाल या अन्य वाम प्रधानिक-प्रभावित क्षेत्रों से नक्सलियों को बड़ी संख्या में हथियार भेजे जा रहे हैं. क्या राज्य सरकारों की चैतन्यता का दृष्टिकोण या अखबारों की तेज़ नज़रों के बिम्ब इन बातों को स्पष्ट नहीं कर सकते कि इन हथियारों (हथियारों के ज़खीरों) के आदान प्रदान का माध्यम क्या है. ट्रांसपोर्ट के किस मीडियम के तहत इन ज़खीरों को पंहुचाया जा रहा है संभाव्य निष्कर्ष यह कि यह मदद राज्य सरकारों के बाशिंदों द्वारा ही पंहुचाई जा रही है. जो अपने लिए एक मजबूत विपक्ष भी तैयार कर रही है. नक्सलियों की मदद करते हुए. जिस जनता को वह बुनियादी सुविधाएं बिजली, पानी, सड़कों के माध्यम से लम्बे समय तक विश्वास के सरोकार को नहीं बना सकती. उस समय में नक्सल विरोधी अभियान राज्य सरकार को जनता के बीच में लोकप्रिय छवि बनवाने में कारगर साबित होंगे.

नक्सलबाड़ी आन्दोलन की शुरुआत एक सुगठित दृष्टिकोण पर भले ही निर्भर न हो, मगर उसका विषय बेहद आवश्यक था.क्रांति दोहराने की निंदा करने वाले भले ही नेपथ्य में बैठे कुछ चरित्र इस आन्दोलन को चीनी-रूसी वाम आन्दोलन थीम के तहत ब्रेड, पीस, सत्ता हथियाने का कारगर हथियार मानते रहे हों. मगर समकालीन परिस्थिति को देखकर ये सपना एक भयावह सच है. इन सब से छुटकारे पाने के सरकारी उपाय बेहद अलोकतांत्रिक और गैर वैचारिक हैं. जो निष्कर्ष हीन हैं.

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के थोथे आलोचक विस्थापन के नाम पर नंदीग्राम का हवाला देते हैं. जो कि उनकी नज़र में सबसे भयावह विस्थापन है. शहर जबलपुर में इन दिनों पावर प्रोजेक्टों की बाढ़ आई है, चुटका,झांसीघाट, बरगी और शहर के १०० कि.मी. के रेडियस में तेज़ी से चल रही प्रक्रिया विस्थापन के उदाहरण में सिंगुर-नंदीग्राम से खतरनाक है. संसाधनों को लेकर किये जाने वाले विस्थापन उन के लिए कतई कारगर नहीं, जिन्हें अपनी ज़मीन छोडनी होगी, वे हमेशा इन से वंचित रहेंगे. बंगाल वही जगह है जहाँ प्रति एकड़ के हिसाब से लाखों की ज़मीन बेचीं जा रही थी. मालिक,बटईदार के आपसी मसलों को सरकार और स्थापित होने वाले संसाधन को भी गिरह में लिया, निष्कर्षतः मामला खटाई में गया. जबलपुर शहर में १०००० हज़ार रूपए प्रति एकड़ के हिसाब से उपजाऊ ज़मीन बेचीं जा रही है, और स्थानीय रहवासी इस श्रृंखला में हैं कि उनकी ज़मीन किस तरह बिक जाए. चुटका में नर्मदा किनारे बस रही फैक्ट्री से यदि किसी भी तरह का रासायनिक स्त्राव होता है तो नर्मदा , नर्मदा न रहेगी. फैक्ट्री के निर्माण में हो रही देरी के विरोध में शहर के तमाम अखबार काले निकले जाते हैं. और तार्किक दलीलों के साथ ज्ञापन सोंपे जाते हैं. जबलपुर और सम्पूर्ण भारत में चल रहे इस विस्थापन का वे कतई विरोध नहीं करते जो आए दिन बंगाल के उदाहरण ले बैठते हैं. बंगाल में जो कुछ हुआ वो बेहद शर्मनाक है, किन्तु अब जो होगा वह शर्मनाक जैसे शब्दों से ऊपर होगा.

_निशांत कौशिक

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

शीर्षकहीन कविता


मन की कई अवस्थाओं में एक अवस्था उत्तेजना होती है, उत्तेजना को एक समूल तर्क के साथ यदि आस पास घट रही मुसलसल घटनाओं से जोड़ कर देखा जाए तो इस कन्वर्ज़न को चैतन्यता कहते हैं. यह घटनाएं हमारे निजी मसलों से भी जुडी होती हैं, एवं सामाजिक सरोकारों से भी सम्बद्ध. उत्तेजना हर पल उठती है, किन्तु इस सामाजिक उत्तेजना को पुनः निजी स्वार्थ से जोड़ा जाए तो यह अभी अभी घटे स्वच्छ वातावरण पर प्रतिवाद के स्तर पर पूरे समाज की चेतना बन जाती है. जो और कुछ नहीं अपने आप में एक 'मुकम्मल बयान होती है' उत्तेजना से चैतन्यता तक के ट्रांसफारमेशन का एक अंश लिए हुए एक कविता. कविता बहुत बार अपने मानसिक चरित्र से बाहर आकर अपने पास मौजूद तर्क प्रस्तुत करती है, और पुनः पुनः लौट जाती है वहीं 'निजी' घटना की ओर. इस बाहर आने की अवधि से सामाजिक सम्बद्धता और पुनः अपने चरित्र में लौटने तक का दौर ही गवाही है, एक ''शीर्षक हीन कविता"।


पहुँच से बाहर नहीं है मेरे
कुछ भी
लेकिन जब मैं पहुँच जाता हूँ वहां
तो बाहर हो जाता हूँ उस ' कुछ भी' से
अपने आप

स्वप्न कुछ नहीं होता
मगर कुछ भी हो जाता है मेरे लिए एक स्वप्न !

अपने लिए कोई सटीक उदाहरण तलाशता मैं
भटक जाता हूँ
जान बूझकर
उस ' प्रसन्न अवस्था ' में जाने से पहले

धीरे से एक ठुनगी मार कर गिरा लेता हूँ
अपना बना - बनाया घर
मारे डर के
कि कहीं मैं बेरोजगार न हो जाऊं

उन दिनों मैं
कुछ ठहर सा गया था
किसी एक बहुत साधारण लेकिन 'सुरक्षित काल' में
और एक दिन
मेरे कान के बहुत पास कोई चिल्लाया
" डरपोक ! तू बेरोजगार है, मानसिक मंदी का शिकार है "

फिर घर, घर कहाँ होते हैं आजकल
कालिख पोतने और पोंछने की जगह बनके रह गए हैं...बस

घर बनाने वालों की शान में
बाहरी दीवारे बिल्कुल साफ रखी जातीं है
छज्जों पर बैठे कबूतरों को गोली मार दी जाती है

इसीलिए मैं एक ठुनगी में गिरा देता हूँ अपना घर
कि
न कालिख पोती जाये
न पोछी जाये
न कबूतरों को गोली मारी जाये
और उसमे मेरा निहित
निजी स्वार्थ ये
कि मैं बेरोजगार न होने पाऊं

हम बिना घर वाले लोग
ठीक - ठाक होते है
हालाँकि हमारे हाथ कुछ भी लग जाये
तो वो कुछ भी नहीं रहता
हम अच्छी तरह समझते है
कि हमारे पहुँच के बाहर कुछ भी नहीं है
'घर' भी नहीं
लेकिन हम,
हम बेरोजगार नहीं होना चाहते |




कविता - रितेश मिश्र

_निशांत कौशिक

बुधवार, 24 मार्च 2010

नशे में आत्मकथा


कंसेप्ट बहुत पहले से गूंज रहा था, मगर इसको शब्दों में उतारने की प्रक्रिया हफ्ते भर पहले ही निभाई गई। कुछ दिन पहले सांस्कृतिक साम्राज्यवाद पर लेख तैयार कर रहा था, उसी समय क्षणिक स्थिति में कुछ रचना तैयार हुई। और इस रचना का मूल कारण भी संस्कृति के पक्ष में होने वाले भिन्न भिन्न अनुमान और उनकी सामाजिक भयावहता ही है. भूल जाने की अस्थाई बीमारी से बचते बचते मैं इसके अंतिम स्वरूप तक पहुँच ही गया।

कविता प्रस्तुत है :

~~~~~~

समकालीन वक़्त
नया संस्करण है
बेवजह की अनुभूतियों से
भर देने को तत्पर
बजते हुए शून्य को

नेपथ्य में कोई हंगामा नहीं है
सारी छायाएं
अब सामने आकर
कर रही हैं
तर्क के नए प्रतिमानों के साथ
मुसलसल प्रतिवाद
जैसे "नशे में लिखी जा रही हो आत्मकथा"

आकाश में बेतरतीबी से फैला रहा हो कोई चूना
सब बदल रहा है अपरिभाषित चित्र में
सुदूर पूर्व में
तहमत संभाले, आँख मलता सूरज
अपने हिस्से की रौशनी फेंक कर
हत्यारों की तरह भाग रहा है एक दिशा से दूसरी दिशा की जानिब
प्रकृति का सबसे सुन्दर हिस्सा कवियों ने हथिया लिया है

अबरू पर शिकन रखे
गोगां और मतीसी
कब्रों से बाहर निकलकर
अपनी पुरानी कूचियों से
वातावरण को रफू करने की
कवायद में मशगूल है

सभ्यता का एक और रोज़नामचा
हाशिये में बलत्कृत, मांदा पड़ा है

चूहों द्वारा कुतरी गई
किसी विचारधारा के चीथड़े
हवा में अलग अलग बह रहे हैं

मौन
सब कुछ वैसे ही
जैसे
छप्पर संभाले
बुजुर्ग लाकड़ को खाए जा रहा है कीट (वैसे संस्कृति कभी बुजुर्ग नहीं होती)
और समूचा घर खामोश है
सारी समझ के साथ
उनके दौर की बुद्धि
विकल्प में
काटे जा रही है
एक हरे भरे दरख़्त को
या आवाज़ है,
बुजुर्ग लाकड़ को
पाटे हुए नारों के साथ
जिंदा रखने की। ( संस्कृति मरती भी नहीं है)

इस दौर के शब्दकोश में
समझदारी को समझौता कहते हैं ।


- निशांत कौशिक

गुरुवार, 18 मार्च 2010

पार्क















कविता के बहुत सारे आयामों में तृष्णा,वेदना,सजगता और संवेदनशीलता होना कविता को उसके मूल अर्थ से जोड़ना होता है और इन सबकी समष्टि लेखक की भिन्न भिन्न परिस्थिति से सरोकार समझौते आदि पर समझ और उसका आकलन ही उसकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति होती है।यह कविता जिसे मैं प्रस्तुत करने के लिए विनम्र कैफियत देना चाहूँगा जिसे मेरी अल्प समझ का तरीका समझे जाने में कोई बुराई नहीं है।

कविता मूलतः दो आयामों में विभक्त है, और इसका पहला आयाम जो प्रात्ययिक या संवेदनशीलता का दौर है कविता में नहीं है। उस संवेदनशीलता में जीना उसको महसूस करना वो एक व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है। और उस अभिव्यति को अतीत समझकर वर्तमान में बैठकर उसका आकलन करना समस्त सांस्कृतिक, सामाजिक और सभी महत्वपूर्ण परिस्थितिओं को मद्देनज़र रखकर ही कविता को सामने आने का कारण देता है।

कविता के पहले भाग में रचनाकार अपने अतीत में हुए तमाम अनुभवों को आज के समय के अनुसार पुनः पुनः आकलन करता है और इस सम्पूर्ण क्रम में दूसरे पक्ष को भिन्न भिन्न तरीकों से आलोचित करते हुए अंत में इन सब अनुभवों से खुद को मुक्त कर लेता है, इन दोनों बातों को रचना के इन दो भागों से समझा जाता है :



"आज इस रोगग्रस्त संझा
पार्क के एक कोने में
इस दिन भर तपे पत्थर पर बैठकर
सोचता हूँ मैं
कि तुमने अच्छा नहीं किया

सोचता हूँ मैं
कि स्थिति परिवर्तन यही होता है शायद
कि तुम ब्राह्मण हो गए और मैं दलित

तुम्हे प्रेम ने इतना बदला मुझको
कि अभी अभी पार्क में आई एक युवती
मुझे कितनी सहज लग रही थी
मेरे यहाँ होने की तरह सहज "

और कविता के एक और आयाम का नमूना यूँ कि

"एक लम्बी सांस लेता हूँ
नथुनों की गर्मी महसूस करता हूँ
उँगलियों के बीच पसीने को पोंछता हूँ
न जाने क्या हथेली में सूंघता हूँ
ऊँगली के एक नाख़ून की फैंच
बहुत ध्यान से देखता हूँ
अब सोचता हूँ
कि क्या जो कुछ भी तुम्हारे बारे में लिखा मैं ने
और सोचा भी
वो तुम भी सोचते होगे
अगर नहीं तो ये सब महज़ आरोप है
सपाट निंदा है
जिसकी अनुभूति मात्र ही
मुझे गहरे, निर्जन, जलहीन कुँए में फेंक देती है
और मेरी आवाज़, शब्द
उस निर्जनता का सौन्दर्य बनकर रह जाती है। "

कविता का मुख्य आकर्षण सौन्दर्यबोध नहीं, बल्कि विचारधारा और संवेदना का सम्मिश्रण है। कि रचनाकार अपने द्वारा अतीत में किये हुए समस्त कृत्य को आकलित करते हुए उसे वैचारिक तरीके से आलोचित कर रहा है और उन कृत्यों को विचारधारा की दृष्टि से समझते हुए सैद्धांतिक तरीके से अपनी संवेदनशीलता को हौले हौले प्रकाश में ला रहा है ।
मसलन :

"सामने एक घास के गुच्छे को घूरता मैं देर तक
सोचता हूँ उत्पादकता के सिद्धांत पर
और दूसरे ही पल अपने पैंट पर गिरे
एक तृण को झाड़ते हुए
अपने उपभोग के बारे में ।

बाज़ार के हाथ कितने लम्बे होते हैं। "

कविता प्रस्तुत है।

आज इस रोगग्रस्त संझा
पार्क के एक कोने
इस दिन भर तपे पत्थर पर बैठकर
सोचता हूँ मैं
कि तुमने अच्छा नहीं किया ।

सोचता हूँ मैं
कि स्थिति परिवर्तन यही होता है शायद
कि तुम ब्राह्मण हो गए और मैं दलित।

तुम्हारे प्रेम ने इतना बदला मुझको
कि अभी-अभी पार्क में आई एक युवती
मुझे कितनी सहज लग रही थी
मेरे यहाँ होने की तरह सहज

सामने एक घास के गुच्छे को घूरता मैं देर तक
सोचता हूँ उत्पादकता के सिद्धांत पर
और दुसरे ही पल
अपने पैंट पर गिरे
एक तृण को झाड़ते हुए
अपने उपभोग के बारे में ।

बाज़ार के हाथ कितने लम्बे होते हैं

ये उसी शहर का एक पार्क है
जिस शहर में
मैं तुमसे पहली बार मिला था
इसी शहर में गुजारी थी
मैं ने अपनी पूरी जिंदगी के सामानांतर
मात्र एक शाम
जब पूरा आसमान पीला पड़ गया था
और बारिश की झिर्रियाँ
ज़मीन पर गिरने से पहले हवा में उड़ रही थीं
तब मैं यह मानकर बैठा था
कि तुम्ही मेरा अंतिम प्रेम होगे
और तुम्हें याद नहीं होगा शायद
तुमने भी आसमान की ओर देखते हुए कहा था
' आई एम थैंकिंग गाड दैट ही मेड यू फॉर मी
तब ज़रूर तुम्हारा ईश्वर मुझपर हंस रहा होगा
हालांकि मैं ईश्वर को नहीं मानता
पर तुम्हारा ईश्वर साक्षी है
कि कैसे बदल ली तुमने अपनी भाषा
और अब तुमको वही शाम एक भावनात्मक त्रुटि नज़र आती है
तुमने कैसे मेरी ढेर सारी स्थितियों को
मुट्ठी भर चिलबिल की तरह
मसल कर फूंक दिया
और मैं कुछ न कर सका।

कभी-कभी लगता है कि तुम्हारा एक पूर्व नियोजित क्रम था
कभी-कभी ये भी लगता है
कि तुमने मुझे अपना "सेफ्टी वाल्व" समझा

एक बार ये भी लगता है
कि तुम मुझ जैसे ही किसी व्यक्ति से ही प्रेम करना चाहती थीं
और मेरी जात के प्रेमियों का एक हिस्सा

जो दिखता नहीं है
और जो दिखाया भी नहीं जा सकता
उसे तुम पचा नहीं पाए
अक्सर ये भी लगता है कि
कहीं न कहीं तुम्हारे सामने
अस्तित्व का घोर संकट आता रहा
जो पहले कभी नहीं आया था
हालांकि आरम्भ में तो वह सुखद था
तुम्हारे लिए
पर बाद में तुम घबराने लगे

असल में तुम्हे चारण पसंद थे
पर तुम्हारे अन्दर का विद्रोह
मुझसे प्रेम कर बैठा
और मैं अभागा तुम्हारे विद्रोह का शिकार
उसे तुम्हारा स्वीकार्य, समर्पण समझ बैठा

इसी पार्क में अपने दाहिने तरफ
उस जामुन के पेड़ को देखता हूँ
कि तुमने अच्छा पाठ पढाया मुझको
कि अगर उस जामुन के पेड़ पर ऊपर चढ़ना हो
तो जिस डाल पे हाथ रक्खा है
उसपे पाँव तो रखना ही होगा
मगर अफ़सोस मैं वो सीख ही नहीं पाया
और अब भी उसी पहली डाल पर बैठा हूँ

कि मैं कुछ कहना भी चाहूँ
तो मेरे एक भी शब्द तुम तक नहीं पहुँच पाते हैं
और तुम कहीं भी थूकते हो
तो एकाध छींटे
मुझपर पड़ ही जाते हैं
तुमने विकास के कितने अच्छे-अच्छे तर्क गढ़े हैं
और मैं अविकसित, पिछड़ा
"स्माल इज ब्यूटीफुल" वाले तर्क को लिए बैठा हूँ
बाज़ार के हाथ कितने लम्बे होते हैं
एक लम्बी सांस लेता हूँ
नथुनों की गर्मी महसूस करता हूँ
उँगलियों के बीच पसीने को पोंछता हूँ
न जाने क्या हथेली में सूंघता हूँ
उंगलीके एक नाख़ून की फेंच बहुत ध्यान से देखता हूँ
अब सोचता हूँ
कि क्या जो कुछ भी तुम्हारे बारे में लिखा मैं ने
और सोचा भी
वो तुम भी सोचते होगे
अगर नहीं तो ये सब महज़ आरोप है
सपाट निंदा है
जिसकी अनुभूति मात्र ही
मुझे निर्जन, गहरे, जलहीन कुँए में फेंक देती है
और मेरी आवाज़, शब्द
उस निर्जनता का सौन्दर्य बनकर रह जाती है

जितना ही मैं तुम्हारे बारे मैं सोचता हूँ
उतना निर्वासित होता जाता हूँ
इस बाज़ार से उतना समझ पाता हूँ
उस मर्दानगी को
छान पाता हूँ खुद को
फिर बटोर लेता हूँ
ताकि मैं बिकाऊ न रह सकूँ
ताकि मेरा कोई मूल्य न हो

बाज़ार के हाथ कितने लम्बे होते हैं।

रचना - रितेश मिश्र


_निशांत कौशिक

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

येहूदा आमिखाई की कविताएं


येहूदा आमिखाई समकालीन हिब्रू कविता के सबसे बड़ी कवि हैं, हिब्रू साहित्य के बहुत से आयाम हैं, जो एतिहासिक,धार्मिक और समकालीन परिस्थिति को साथ में लेकर बने हैं। इसके बावजूद आमिखाई की कविता में इन सबका एक विश्लेषणात्मक और सुलझा हुआ स्वरूप मिलता है जो आमिखाई की कविता में एक स्पष्ट धारा बनकर चलता रहता है।
आमिखाई का जन्म १९२४ में जर्मनी में हुआ था, "विस्थापन" जैसी दुरुहता के विपरीत चलने वाली परिस्थितियों ने आमिखाई और उसकी कविता को निखारा। अपनी पहली कविता संग्रह के प्रभाव से ही वो विश्व कविता में महत्वपूर्ण स्थान पा गए। संवाद प्रकाशन से प्रकाशित येहूदा आमिखाई का कविता संग्रह "धरती जानती है" नज़रों से गुज़रा, और उसकी पहली कविता ने ही मुझे बहुत आकर्षित किया, इस कविता को में सबसे पहले सामने रखूँगा। अनुवादक अशोक पाण्डेय (नैनीताल) ने आमिखाई के प्रति एक स्पष्ट बयान दिया है, जो बाकी सब बातों से महत्वपूर्ण है।

"भारतीय सन्दर्भ में देखें तो धर्म और धार्मिक संस्कारों के बारे में कविता लिखना शायद संभव नहीं, क्योंकि इसमें सांप्रदायिक करार दिए जाने का जोखिम तो है ही साथ ही यह भी कि सांप्रदायिक शक्तियां उस कवि को अपनी ढाल बनाना चाहें। येहूदा की कविता अपनी संस्कृति और धर्म के स्तर पर इस तिलिस्म को भी तोडती हैं। वे बार-बार बाइबिल-कथाओं, चरित्रों और घटनाओं का उल्लेख करते हैं। कई बार तो बाइबिल की पंक्तियों के लम्बे उद्धरण भी प्रस्तुत करते हैं और यह सब कुछ कविता में करना थोडा अजीब लग सकता है। सबसे ख़ास बात यह है कि येहूदा अपने समाज में कुछ कह पाने के लिए इन बातों के महत्त्व को अच्छी तरह जानते हैं और उनका इस्तेमाल अपने ढंग से करते। यही वजह है कि वे अवसर मिलने पर "मैं बाइबिल को गड़बड़ा देना चाहता हूँ" जैसी कविता लिखने से भी नहीं चूकते"।

येहूदा की मृत्यु २००० में इजराइल में हुई।

कविताएं प्रस्तुत हैं :


~~~~~

तीस सेंटीमीटर था बम का व्यास
और इसका प्रभाव पड़ता था सात मीटर तक
चार लोग मारे गए, ग्यारह घायल हुए
इनके चारों तरफ एक और बड़ा घेरा है -- दर्द और समय का
दो हस्पताल और एक कब्रिस्तान तबाह हुए
लेकिन वह जवान औरत जो दफनाई गई शहर में
वह रहने वाली थी सौ किलोमीटर से आगे कहीं की
वह बना देती है घेरे को और भी बड़ा
और वह अकेला शख्स जो समुन्दर पास किसी देश के सुदूर किनारों पर
उसकी मृत्यु का शोक कर रहा था --
समूचे संसार को ले लेता है इस घेरे में

और मैं अनाथ बच्चों के उस रुदन का ज़िक्र तक नहीं करूँगा
जो पहुँचता है ऊपर ईश्वर के सिंहासन तक
और उससे भी आगे
जो एक
घेरा बनाता है
बिना अंत और बिना ईश्वर का ।


~~~~
हम दोनों के साथ घटी बाइबिल की सारी गाथाएं
और चमत्कार
हम जब साथ थे

ईश्वर की शांत ढलान पर
हम कुछ देर कर सके आराम

गर्भ की हवा चली हमारे लिए हर जगह
हमारे पास समय था हमेशा।

~~~~

मुझे एक ऐसी धरती दिखाओ
जहाँ की औरतें
वहां के पोस्टरों पर बनी औरतों से ज्यादा खुबसूरत हों
और जिनका ईश्वर लगाता हो
मेरी आँखों के गिर्द, मेरे माथे पर और मेरी दुखती गर्दन पर
अच्छे अच्छे लेप

'फिर कभी नहीं पाउँगा अपनी आत्मा के लिए आराम'
हर दिन
एक नया आखिरी दिन
गुज़र जाता है और मैं ज़रूर लौटता हूँ
उन जगहों पर जहाँ वे मुझे नापते हैं
तब तब बढ़ चुके पेड़ों से और उस सबसे जो नष्ट हो चुका

मैं अपने पैर पटकता हूँ और घसीटता हूँ
अपने जूते
चढ़ पाने के लिए उस उस सब पर
जो मुझे पहले ही नीचे धकेल चुका है
मेरी आत्मा का गोबर
भावनाओं की धूल
और प्रेम की रेत

'
फिर कभी नहीं पाऊंगा अपने अपनी आत्मा के लिए आराम'
मुझे बैठा जाने दो एक पियानोवादक
या एक नाई की घुमने वाली कुर्सी पर
और मैं घूमता जाऊं गोल गोल
आराम से आखीर तक....

~~~~

मेरे पिता ने युद्धों में बिताए चार वर्ष
और अपने शत्रुओं से घृणा नहीं की, प्यार भी नहीं किया
और तब मैं भी जानता हूँ कि किसी तरह वहां भी
वे मेरे निर्माण में लगे हुए थे, अपनी शान्तियों में से
जो इतनी विरल और बिखरी हुई थीं, जिन्हें उन्हों ने
बम-विस्फोटों और धुंए के बावजूद चमके रखा
और अपनी माँ के दिए हुए कड़े होते केक के बीच, उन्हें
अपने झोले में रख लिया
और अपनी आँखों में उन्होंने रख लिया
बेनाम मृतकों को
उन्हों ने सम्हाल लिया उनको, ताकि किसी दिन
उनकी दृष्टि से मैं उन्हें देख सकूँ और प्यार कर सकूँ --ताकि मैं
भय से भर न जाऊं जैसे वे सारे मर गए...
उन्होंने अपनी आँखों को उनसे भर लिया, लेकिन तब भी वह बेकार रहा
अपने सारे युद्धों में न चाहकर भी मुझे जाना ही होगा

~~~~

एक औरत
जो मेरी माँ की
तरह लगती है
देखती है
एक आदमी को जो लगता है
मेरी तरह

गलतियाँ भी अद्भुत होती हैं और आसान
बालकनी में गाती हुई लड़कियां
टांगती हैं
अपने कपड़ों को बहार सूखने के लिए
--वे पताकाएं प्रेम की

धागों के कारखाने में
वे बनाते हैं रस्सियाँ महीन धागों को बटकर
जीवन के पुलिंदे में
आत्माओं को बंधने के वास्ते

दोपहर की बहती हवा
मानो पूछती हैं कि 'तुमने क्या किया
किस बारे में तुम बात करते थे'

पुराने पथरीले घरों में जवान औरतें अब दिन-दहाड़े करती हैं
वह सभी कुछ
जिसे उनकी माओं की माएं रातों में करने का ख्वाब देखती थीं
वह आर्मेनियाई चर्च खाली है
और बंद
किसी परित्यक्त औरत की तरह
उधर महिला सुधार-गृह में
लडकियां गाती हैं
-- 'अपनी महान दयालुता में
ईश्वर लाएगा मृतकों को जीवन में वापस'
और अपने सूखे कपडे तहाती हैं।

~~~~

उस दिन जब मैं गया
वसंत जैसे फट पड़ा अँधेरे के बारे में कही गई कहावतों को
सही साबित करने के लिए

रात हमने साथ खाना खाया
उन्होंने शोभा, पवित्रता और स्वच्छता के लिए सफ़ेद मेजपोश बिछाया
मोमबत्ती जलाईं क्योंकि रस्म
मोमबत्ती जलाने की

हमने खूब खाया और हम जानते थे
कि मछली की आत्मा
उसकी खोखली हड्डियों मैं होती है

एक बार फिर हम समुद्र पर खड़े थे
कोई पहले ही साफ़ कर चुका था
सारे चीज़ें
और प्रेम -- बस दो रातें
दुर्लभ डाक टिकटों की तरह ह्रदय को आघात पहुँचाने के लिए
बिना उसे तोड़े

मेरा सफ़र बहुत हल्का है
यहूदियों की प्रार्थनाओं सा
मुझे उठा लिया जाता है
जैसे उठा ली जाती है निगाह
या फिर दूसरी जगह को उड़ान भरता
कोई जहाज

~~~~

युद्ध के पहले दिनों में रचना हुई थी
हमारे शिशु की
उस भीषण रेगिस्तान को देखने दौड़ा था मैं

फिर रात को लौटा उसे सोया हुआ देखने को
वह अभी से भूल रहा है अपनी माँ के स्तन और वह
भूलता ही जायेगा अगले युद्ध तक

और इस तरह जब वह छोटा ही था
उसकी आशाएं बंद हो गईं और खुल गया शिकायतों का उसका पुलिंदा
कभी बंद न होने का।

~~~~

दूसरे देश में
प्रेम करना चाहिए हमेशा उस लड़की से
जो इतिहास की छात्रा हो
इन पहाड़ों की तलहटी पर
तुम्हें लेटना चाहिए उसके साथ इस घास पर
और सिसकारियों और आहों के बीच
वह तुम्हें बताएगी
कि पहले यहां क्या हो चुका है

'जीवन बहुत गंभीर मसला है'
मैं ने जानवरों को हँसते हुए कभी नहीं देखा।

~~~~

जैसे आप पिछवाड़े बरामदे की बत्ती बुझाना भूल जाएं
ऐसा होता है किसी को भूलना
सो वह जली रहती है अगले दिन भर

लेकिन फिर रौशनी ही आपको
दिलाती है याद

~~~~

अगर तुम अपना कोट उतारोगी
तो मुझे दूना करना होगा अपना प्यार

अगर तुम गोल, सफ़ेद हैट पहनोगी
मुझे उन्नत करना होगा अपना रक्त

जहाँ तुम प्यार करती हो
उस कमरे से सारा फर्नीचर हटाना होगा

सारे पेड़, सारे पहाड़, सारे महासागर
बहुत संकरी है दुनिया

~~~~

मेरे पास बहुत सारे मृतक हैं
हवा में दफनाए हुए
मेरे पास जीवन से वियुक्त एक माँ है
कुल मिलकर
मैं खुद जीवित हूँ अभी तक

मैं 'जगह' की तरह हूँ
लड़ता हुआ 'समय के खिलाफ'

खिड़की पर तुम्हारे चेहरे के पीछे
कभी हरा रंग बहुत खुश था
सिर्फ मेरे सपनों में मैं अभी तक करता हूँ प्रेम
पूरी ताक़त के साथ।

~~~~

एक हवाई जहाज
अंजीर के पेड़ के ऊपर से गुज़रता है
वह दरअसल गुज़रता है
अपने अंजीर के नीचे खड़े आदमी के ऊपर से
मैं जहाज़ का पायलट हूँ
और अंजीर के नीचे खड़ा आदमी भी मैं हूँ
मैं बाइबिल को गड़बड़ा देना चाहता हूँ
मैं बाइबिल को बहुत ज्यादा गड़बड़ा देना चाहता हूँ

मैं पेड़ों में आस्था रखता हूँ
ऐसे नहीं
जैसे की वे रखते थे
मेरी आस्था
अल्पजीवी है -- बस अगले वसंत तक की
बस अगली सर्दियों तक की
मैं बारिश के होने और धूप के खिलने में विश्वास करता हूँ
गड़बड़ा गए हैं व्यवस्था और न्याय
अच्छे और बुरे मेरे लिए आगे पड़ी मेज़ पर रखे
नमक और काली मिर्च जैसे हैं
मैं बाइबिल को बहुत ज्यादा गड़बड़ा देना चाहता हूँ

संसार भरा हुआ है
अच्छे और बुरे ज्ञान से
वह भरा हुआ है सीखने-सिखाने के तौर तरीकों से --
पक्षी सीखते हैं बहती हुई हवाओं से

हवाई जहाज़ सीखते हैं पक्षियों से
और लोग उन सभी से सीखते हैं और भूल जाते हैं
पृथ्वी उदास है, इसीलिए नहीं कि उसमें दफ़न है मृतक
जैसे मेरी प्रेमिका की पोशाक इसीलिए खुश नहीं है कि वह रहती है
उसके भीतर
बदल हैं आदमी के बेटे
और अररात एक गहरी घाटी है
और मैं वापिस नहीं लौटना चाहता
क्योंकि सारी बुरी खबरें घर लौटती हैं
जैसे कि 'जॉब' की किताब में

होबेल ने केन ही हत्या की
और मोजेज़ ने क़दम रखे उस धरती पर जिसका वादा था
और इजराइल की संतानें छूट गईं रेगिस्तान में
मैं इज़ेकेयिल के दैवीय रथ में यात्रा करता हूँ
और इज़ेकेयिल खुद नाचता है सुखी हड्डियों की घाटी में
मिरियाम की की तरह
सोडोम और गोमोर्राह चहल-पहल भरे कस्बे हैं
और 'लाट' की पत्नी
नमक नहीं चीनी और शहद के खम्भे में तब्दील हुईं
और डेविड -- इज़राइल का राजा
जीवित है
मैं बाइबिल को गड़बड़ा देना चाहता हूँ
मैं बाइबिल को बहुत ज्यादा गड़बड़ा देना चाहता हूँ।

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निशांत कौशिक



रविवार, 7 मार्च 2010

फायरबाख पर निबंध

मार्क्स का उपरोक्त जर्मन कथन दर्शन की दुनिया में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है, १८४५ मेंफायरबाख पर मार्क्स ने आलोचनात्मक लेख लिखा फायरबाख के इस निबंध के अंत में मार्क्स ने उपरोक्तकथन को प्रस्तुत किया।

फायरबाख जर्मन दार्शनिक थे। फायरबाख का मुख्य कार्य क्षेत्र धर्म की तात्विक औरभौतिकवादी मीमांसा है, जो कि धर्म के व्यवहारिक कार्य क्षेत्र और उसके आध्यात्मिक आवरणको भौतिकवादी तरीके से प्रस्तुत करती है, फायरबाख के इस दृष्टिकोण में मुख्य समस्या धर्मके सामाजिक आवरण की भौतिकवादी तथा उसके भाववाद को अपेक्षित समीक्षा के विरोधक्षेत्र में स्थापित करती है, सरल शब्दों में फायरबाख (फ्वारबाख) धर्म की सामाजिक भूमिकाको भौतिकवादी दृष्टिकोण से तथा उसके आध्यात्मिक क्षेत्र को प्रत्ययवादी चिंतन के मोड़ परखड़ा कर देते हैं। इससे समाज में क्रियाशील धार्मिक ढांचे भाववाद के पक्ष में रखकर अपनेआप को आलोचना से मुक्त कर लेते हैं। मार्क्स का ये निबंध फायरबाख के दृष्टिकोण कीआलोचना है, और मार्क्स का ये दृष्टिकोण धर्म की सामाजिक भूमिका को भौतिकवादीदृष्टिकोण से स्पष्ट करता है भाववाद को साथ में आलोचित करते हुए। इस लेख कामहत्त्वमार्क्स के द्वारा लिखा जाना नहीं है,और न ही मार्क्सवादी दृष्टिकोण का इसमें कुछअनुपात है, यह भौतिकवादी नज़रिए की सहायता से की गई आलोचना तो है ही बल्कि धर्म केसभी सक्रीय छद्म हिस्सों में कड़ा प्रहार भी है। आलोचनात्मक दृष्टिकोण तथा दर्शन के क्लिष्ट शब्दों से परिपूर्ण यह लेख पढने में कुछ दुष्कर हो सकता है। मगर महत्वपूर्ण होने की वजह से इसे यहाँ प्रस्तुत करना यह लेख पाठको के लिए अत्यंत आवश्यक हो सकता है।

_निशांत कौशिक

1

अब तक के सारे भौतिकवाद की - जिसमें फायरबाख का भौतिकवाद भी शामिल है - की मुख्य त्रुटि यह है कीवस्तु,वास्तविकता तथा एन्द्रियता को केवल विषय या अनुध्यान के रूप में कल्पित किया जाता है, न कि मानव केइन्द्रियगत क्रियाकलाप, व्यवहार के रूप में। इसका परिणाम यह हुआ कि क्रियाशील पक्ष भौतिकवाद द्वारा नहीं,बल्कि प्रत्ययवाद द्वारा विकसित किया गया - किन्तु मात्र अमूर्त रूप में, क्योंकि प्रत्ययवाद वास्तविक इन्द्रियगतक्रियाकलाप से सर्वथा अपरिचित है। फायरबाख विचार-वस्तुओं से वास्तव में विभेदित इन्द्रियगत वस्तुओं कोचाहते हैं, पर वह स्वयं मानव क्रियाकलाप को वस्तुनिष्ठ क्रियाकलाप के रूप में नहीं देखते। इसीलिए अपनी पुस्तकईसाई धर्म का सार में वह सैद्धांतिक रुख को ही एक मात्र सच्चा मानवीय रुख मानते हैं, जबकि व्यवहार की प्रतीतिका निकृष्ट प्रवंचक रूप ही मानते व सिद्ध करते हैं। इसीलिए वह "क्रांतिकारी" तथा "व्यवहारिक - आलोचनात्मक" क्रियाकलाप का महत्त्व नहीं समझ पाते।

2
यह प्रश्न, कि क्या वस्तुनिष्ठ सत्य को मानवीय चिंतन का सहज गुण माना जा सकता है, सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक प्रश्न है। विवहार में मनुष्य को अपने चिंतन की सत्यता, याने यथार्थता एवं शक्ति, उसकी इहपक्षता को प्रमाणित करना पड़ता है। व्यवहार से पृथक रूप में चिंतन की यथार्थता अथवा यथार्थता सम्बन्धी विवाद कोरा पंडिताऊ (scholastic) प्रश्न है

3

यह भौतिकवादी सिद्धांत कि मनुष्य परिस्थितियों तथा शिक्षा - दीक्षा की उपज है, और इसीलिए परिवर्तित मनुष्य भिन्न भिन्न परिस्थितियों एवं भिन्न शिक्षा-दीक्षा की उपज है, इस बात को भुला देता है कि परिस्थितियों को मनुष्य ही बदलते हैं और स्वयं शिक्षा और स्वयं शिक्षक को शिक्षा ग्रहण करने की आवश्यकता होती है। अतः यह निष्कर्ष सिद्धांत अनिवार्यतः समाज को दो भागों में विभक्त कर देने के निष्कर्ष पर पहुँचता है, जिनमें से एक भाग समाज के ऊपर होता है। परिस्थितियों के परिवर्तन तथा मानवीय क्रियाकलाप का संयोग केवल क्रांतिकारी व्यवहार के रूप में ही विचारो तथा तर्कबुद्धि द्वारा समझा जा सकता है।

४

फायरबाख धार्मिक वियोजन (feuerbach religious self-dissociation) - अर्थात जगत की दो दुनिययों, एक काल्पनिक, धार्मिक दुनिया तथा दूसरी वास्तविक दुनिया, में विभाजन - के तथ्य से आरम्भ करते हैं। उन्होंने काम यह किया है कि इस धार्मिक जगत को उसके लौकिक आधार में विलयित कर दिया। वह इस तथ्य को नज़रन्दाज कर देते हैं कि उपरोक्त कार्य की पूर्ति के बाद मुख्य कार्य फिर भी अधुरा रह जाता है। इसीलिए कि यह बात कि भौतिक आधार स्वयं को स्वयं से पृथक कर लेता है और जाकर आसमान में स्वयं को एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में स्थापित कर लेता है, केवल इस लौकिक आधार के आत्मविभाजन व आत्मविरोध द्वारा ही समझी जा सकती है। अतः लौकिक आधार को पहले उसके अंतर्विरोध की अवस्था में समझा जाना चाहिए। मिसाल के तौर पर, एक बार यह सिद्ध हो जाने पर कि पवित्र परिवार की जड़ वास्तव में पार्थिक परिवार है, पार्थिव परिवार की सिद्धांततः आलोचना की जानी चहिये और फिर व्यवहार में उसका क्रांतिकारी रूपांतरण किया जाना चाहिए।

5

अमूर्त चिंतन से असंतुष्ट फायरबाख इंद्रिय अनुध्यान (प्रत्ययवादी धारणा की मदद से कल्पित विचारों के समक्ष चिंतन को पुनः पुनः परिभाषित करना) की शरण लेते हैं, पर वह एन्द्रियता को व्यवहारिक मानव-इंद्रिय क्रिया के रूप में नहीं विचारते।

६

फायरबाख धार्मिक सारतत्त्व को मानवीय सारतत्त्व में विघटित कर देते हैं। पर मानवीय सारतत्त्व कोई अमूर्त तत्त्व नहीं है जो प्रत्येक व्यक्ति में अन्तर्निहित हो।
अपनी यथार्थता में वह सामाजिक संबंधों का समुच्चय है। फायरबाख जो इस यथार्थ सारतत्त्व की समीक्षा नहीं करते, परिणाम स्वरूप इस बात के लिए बाध्य होते है कि :

१.एतिहासिक प्रक्रिया से अपकर्षित करके धार्मिक भावना को स्वयंस्थित वस्तु के रूप में प्रतिष्ठित करें और एक अमूर्त - पृथक्कृत - मानव व्यक्ति की पूर्व धारणा करें।
२. उनकी दृष्टि में मानवीय सारतत्त्व केवल वंश की शक्ल में समझा जा सकता है, अर्थात मूक अन्तर्निहित सामान्यता(अर्थात सामान्य तौर पर मानव समाज में अंधी प्रचलित धारणा) के रूप में जो केवल प्रकृत्या नाना व्यक्तियों को ऐक्य्बद्ध कर देती है।

७

परिणाम स्वरूप, फायरबाख यह नहीं देख पाते कि "धार्मिक भावना" स्वयं ही एक सामाजिक उपज है तथा जिस अमूर्त व्यक्ति का उन्होंने विश्लेषण किया, वह वस्तुतः समाज की एक विशेष अवस्था (निश्चित रूप) का प्राणी है।


८

सामाजिक जीवन मूलतः व्यवहारिक है। सारे रहस्य, जो सिद्धांत को रहस्यवाद के गलत रस्ते में डाल देते हैं, मानव व्यवहार में, और इस व्यवहार के संज्ञान(Cognizance) में, अपना बुद्धि संगत समाधान पाते हैं।

९

अनुध्यानवादी भौतिकवादी की - अर्थात भौतिकवाद की जो एन्द्रियता को व्यवहारिक क्रियाकलाप नहीं मानता - " चरम उपलब्धि"नागरिक समाज में पृथक व्यक्तियों का अनुध्यान है ।

१०

पुराने भौतिकवाद का दृष्टि - बिंदु "नागर" समाज है, नये भौतिकवाद का दृष्टि बिंदु मानव समाज या समाजीकृत मानवजाति है।

११
दार्शनिकों ने विभिन्न विधियों से दुनिया की केवल व्याख्या ही की है, लेकिन प्रश्न दुनिया को बदलने का है।


_साभार - (परिशिष्ट) लुडविग फायरबाख और क्लासिकीय जर्मन दर्शन का अंत।

निबंध के बारे में - फायरबाख के दर्शन पर केन्द्रित इस निबंध की रचना कार्ल मार्क्स ने १८४५ के बसंत मेंब्रसेल्स में की थी। यह निबंध उनकी १८४४-१८४७ की नोटबुक में शामिल है। सबसे पहले इसे फ्रेडरिक एंगेल्स नेअपनी कृति लुडविग फायरबाख और क्लासिकीय जर्मन दर्शन का अंत में परिशिष्ट के रूप में शामिल किया था।

अंत में चंद पंक्तियों के साथ लेख समाप्त करता हूँ, यह पंक्तियाँ मूल जर्मन में लिखी गई है, इसके अनुवादक औररचनाकार से मैं पूर्णतः अनभिज्ञ हूँ।


"तय मानो, तुम्हारी दासता के लिए
मैं अपने विपदाग्रस्त भाग्य से
मुक्ति नहीं चाहूँगा
देवराज का चाकर बनने से बेहतर
होगा इस चट्टान का चाकर होना। "

मंगलवार, 2 मार्च 2010

एक भाषा की मृत्यु.......!

अंडमान की ८५ वर्षीय महिला "बोआ बुजुर्ग" जो "बो" भाषा को समझने का अंतिम माध्यम थीं।


इस लेख को संक्षिप्त में २ भागो में रखता हूँ, पहली तो "बो" और दूसरा भारत में " हिंदी के समकालीन सरलीकृत साहित्य के प्रति"।

" बोआ " इस नाम से इन दिनों सभी परिचित होंगे, "बोआ" अंडमान के विशेष अंडमानी जाति के आदिवासी समुदाय की ८५ वर्षीय महिला थी, जो बीते दिनों स्वास्थ्य के चलते विदा हो गई। अंडमान की मुख्य १० भाषाओं में एक " बो " भाषा जो कि मूल रूप से संवाद आदि माध्यमों में ज्यादा परिपक्व थी, बजाय साहित्य के। इस ८५ वर्षीय महिला के साथ यह भी ख़तम हो गई। भाषा वैज्ञानिकों के पास इस भाषा के प्रति बहुत शोध हैं, मगर इसको वार्तालाप के तरीके तक लाने का माध्यम अब नहीं रहा, और अंडमान की बहुत ख़ास भाषा के साथ साथ एक जनजाति भी ख़तम हो गई। और तमाम तरह के साधन होने के बावजूद यदि इतिहास को खंगालेगा भविष्य तो "बो" संस्कृति की पहचान के अवशेष मिलेंगे मगर उन के प्रतीकों को समझने वाला अब कोई नहीं बचा। बस गवाह यह कि "एक भाषा की मृत्यु हमारे सामने हुई"

ये वक़्त
वक़्त नहीं मुक़दमा है
या तो गवाही दो
या गूंगे हो जाओ _ चंद्रकांत देवताले

सूचना प्रौद्योगिकी के दौर में भारत जैसे बहुभाषी देश में, कई बोलियाँ शिकस्त पर आ चुकी हैं। ग्रियर्सन और अनेक शोधों के परिणाम स्वरूप बोलियों में घटोत्तरी - बढ़ोत्तरी हो रही है, जिसमें नई मिश्रित भाषाएँ (बोली) तो आ रही हैं, वहीं पुरानी बहुत सी बोलियों का अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है। सीधे कहा जाए कि बहुभाषी देश होने के बावजूद भारत में इतनी विशाल संस्कृतियों, भाषाओं,बोलियों को बचाने के कोई उपाय नहीं किये जा रहे, और ये सब बोलियां हाशिये पर हैं, इनकी संस्कृति से उन लोगो को कोई मतलब नहीं जो अपनी प्रादेशिक या राष्ट्रीय छद्म संस्कृति के लिए तलवार लिए खड़े हैं। हिंदी साहित्य में एक नयी पीढ़ी (आमतौर पर) तैयार हो रही है, जिनकी सृजन क्षमता मात्र उनकी अभिव्यक्ति खासकर "प्रेम" पर जाकर समाप्त हो जाती हैं। इंटरनेट में ही मैं ने कई अनुभवी ४०-४५ साल के लोगों को मूल्यहीन प्रेम कविताओं में अपना समय बांटते देखा है, अपने ब्लोग्स में ये कविताएँ पोस्ट करने पर टिप्पणी की संख्या देखकर उनकी रचना के स्तर का निर्धारण होता है, और टिपण्णीकर्ता भी बिना कुछ पढ़े,समझे आत्मीय संबोधनों से रचनाकार को खुश कर देते हैं कि भविष्य में हमारी किसी रचना के प्रति इनके विचार शुभ रहे। और आलोचना करने पर कविता को " अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" कहकर फ़ौरन दामन छुड़ा ले जाते हैं। मुश्किल से चंद जगहों पर कविता,रचना की मीमांसा या उसकी खुलकर आलोचना देखने पाती है।

उर्दू भाषा में लिखे गए साहित्य में कम से कम ७६% साहित्य वस्ल,राहत,बेवफा,वफ़ा,रुसवाई जैसे शब्दों से अटा पड़ा है,जिसमें,ग़ालिब,मीर,वली दकनी,आदिल शाह,वाजिद अली शाह, बहादुर शाह ज़फर आदि मुख्य तौर पर सामने आते हैं। इनकी अगली पीढ़ी में ब्रजनारायण चकबस्त (आध्यात्मिक एवं राष्ट्र मीमांसात्मक) ,नज़ीर(लोक रंग), इकबाल (शुरू में रहस्यवादी या सूफी खासकर हाफिज़, सादी और रूमी,राष्ट्र भक्ति, इस्लामिक धारा ), फिराक़ गोरखपुरी (तत्व मीमांसा, दृष्टि योजना, प्रयोगवाद) आदि मुख्य हैं, जो साहित्य की तत्कालीन धारा को प्रभावित करते हैं।
हिंदी साहित्य के साथ कम से कम शुरू में ये समस्या नहीं रही मगर अब यही समस्या प्रवाह बनकर छा रही है, इलेक्ट्रोनिक मीडिया,अखबार जगत में ये वर्ग इस तरह छाया है कि वास्तव में जो गंभीरता से लिखा जा रहा है वह इस विशाल मूल्यहीन साहित्य के नीचे दबा चला जा रहा है।
उनका कहना है कि अब कविता मनोरंजन का साधन बन गई है, कैम्पस में जयशंकर प्रसाद, या किसी आधुनिक कवि की समझ से लिखी गई कविताएँ नहीं कुमार विश्वास की श्रृंगार लालित्य से परिपूर्ण कविताएँ सुनी जा रही हैं, और ये लोगो को पसंद भी हैं, इसमें सवाल कुमार विश्वास पर नहीं, हमारी समझ पर है कि साहित्य को कब तक इसी रूप में स्वीकार करते रहेंगे। क्या इस तरह से साहित्य बचा रह सकता है, जो व्यक्तिवादी अभिव्यक्तियो से भरा पड़ा हो, बजाय उस समय के आकलन के।
खैर! भाषाई साम्राज्यवाद की परिभाषा में स्पष्ट किया था कि हिंदी का ख़ास रूप समाज में विकसित होते होते कहीं और जा मिला और साहित्य को तो फिलहाल छोड़ा ही जाए, हम प्रेमचंद,शरत चन्द्र,मंटो को पढ़कर बड़े हुए हैं, और अब बच्चे चेतन भगत को पढ़कर युवा हो रहे हैं। सवाल ये नहीं कि चेतन भगत को छोड़कर प्रेमचंद को पढना चाहिए, या कुमार विश्वास की जगह कबीर के बीजक को गाना चाहिए।सवाल यह कि हम कब तक ये बचकानी हरकतें करते रहेंगे, साहित्य देश की संस्कृति,मानसिक चिंतन,वैचारिकता सभी को सामने रखता है, किन्तु ये साहित्य अगर कहीं रखा जाए तो संस्कृति की नहीं, बस किसी व्यक्तिवादी धारणा की पहचान हो सकती हैं। इंटरनेट में कई वेबसाईट हैं जहाँ आर्थिक योगदान करके आसानी से सूची में शामिल हुआ जा सकता है। भले ही आपकी रचनाओं में कुछ हो या न हो। जीतेन्द्र गुप्ता ने एक बहुत उम्दा बात रखी थी, कि "क्या किसी भाषा का अस्तित्व सिर्फ कहानी,उपन्यास,कविता पर टिका हुआ है " ? अगर इसका उत्तर हाँ है तो भाषा का अस्तित्व खतरे में हैं, और अगर नहीं तो मैंने " भाषाई साम्राज्यवाद " लेख में पहले ही कह दिया था कि हिंदी भाषा समाज से कैसे विमुख हो रही है, और ये कैसे मिश्रित परिधान पहनकर हमारे जीवन में प्रवेश कर रही है। इसी लेख से मिलती जुलती एक कविता रखकर लेख समाप्त करता हूँ ।



चिंता करो मूर्धन्य " ष " की
किसी तरह बचा सको तो बचालो "ङ"
देखो,कौन चुरा कर लिए चला जा रहा है खड़ी पाई
और नागरी के सारे अंक
जाने कहाँ चला गया ऋषियों का " ऋ "

चली आ रही हैं इस्पात,फाइबर और अज्ञात यौगिक
धातुओं की तमाम अपरिचित - अभूतपूर्व चीज़ें
किसी विस्फोट के बदल की तरह हमारे संसार में
बैटरी का हनुमान उठा रहा है प्लास्टिक का पहाड़
और बच्चो के हाथों में बोल रही कोई
डरावनी चीज़ _ डीप..डीप..डीप

बचालो मेरी नानी का पहियों वाला काठ का नीला घोडा
संभाल कर रखो अपने लट्टू
पतंगें छुपा दो किसी सुरक्षित जगह पर

देखो, हिलता है पृथ्वी पर
अमरुद का अंतिम पेड़
उड़ते हैं आकाश में पृथ्वी के अंतिम तोते

बताएं सारे विद्वान्
मैं कहाँ पर टांग दूँ अपने दादा की मिरजई
किस संग्रहालय को भेजूं पिता का बसूला
माँ का करधन और बहन के बिछुए मैं
किस सरकार को सौंपू हिफाज़त के लिए

मैं अपील करता हूँ राष्ट्रपति से कि
वे घोषित करें
खिचड़ी,ठठेरा,मदारी,लोहार,किताब,भड्भुन्जा,कवि और हाथी को
विलुप्तप्राय राष्ट्रीय प्राणी

वैसे खडाऊं ,दातुन और पीतल के लोटे को
बचाने की इतनी सख्त ज़रूरत नहीं है
रथ,राजकुमारी,धनुष,ढाल और तांत्रिकों के
संरक्षण के लिए भी ज़रूरी नहीं है कोई कानून

बचाना ही हो तो बचे जाने चाहिए
गाँव में खेत,जंगल में पेड़,शहर में हवा,
पेड़ों में घोंसले,अखबारों में सच्चाई,राजनीति में नैतिकता
प्रशासन में मनुष्यता, दाल में हल्दी

क्या कुम्हार, धर्म निरपेक्षता और
एक दुसरे पर भरोसे को बचाने के लिए
नहीं किया जा सकता संविधान में संशोधन

सरदार जी, आप तो बचाइए अपनी पगड़ी
और पंजाब का टप्पा
मुल्ला जी, उर्दू के बाद आप फ़िक्र करें कोरमे के शोरबे का
ज़ायका बचाने का

इधर मैं फिर एक बार करता हूँ प्रयत्न
कि बच सके तो बच जाये हिंदी में समकालीन कविता।


कविता_उदय प्रकाश



_निशांत कौशिक